अमेरिका-ईरान समझौते पर टिकी दुनिया की नजर, होर्मुज से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक कई पेंच बरकरार

नई दिल्ली, 15 जून (RNN)। अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों से जारी संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रगति के संकेत मिले हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दोनों देशों के बीच एक प्रारूप समझौता (मसौदा ज्ञापन) तैयार किया गया है, जिसमें युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने, तेल प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और परमाणु कार्यक्रम पर नई वार्ता जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर और उसकी शर्तों की स्वीकार्यता को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं।

सूत्रों के मुताबिक प्रस्तावित समझौते में सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने, विशेष रूप से लेबनान में संघर्ष विराम सुनिश्चित करने का प्रावधान शामिल है। ईरान लंबे समय से किसी भी शांति समझौते को क्षेत्रीय युद्धविराम से जोड़ता रहा है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने इस मांग पर नरम रुख अपनाया है और व्यापक संघर्ष विराम पर सहमति जताई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बनेगा सबसे अहम केंद्र

संभावित समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना माना जा रहा है। प्रस्तावित मसौदे के अनुसार ईरान सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए जलमार्ग खोल देगा, जबकि अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा। बताया जा रहा है कि नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया समझौते के बाद शुरू होकर 30 दिनों में पूरी होगी।

होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। युद्ध के दौरान इस मार्ग में व्यवधान आने से वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई थी।

भारत के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलमार्ग खुलने से आपूर्ति सामान्य होगी और तेल कीमतों पर दबाव कम पड़ सकता है, हालांकि सुरक्षा और बीमा लागत बढ़ने के कारण तत्काल बड़ी राहत की उम्मीद नहीं की जा रही।

तेल प्रतिबंधों में राहत और 25 अरब डॉलर की संपत्ति वापसी का प्रस्ताव

रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट देने तथा नई आर्थिक पाबंदियां नहीं लगाने का आश्वासन दिया है। इसके तहत ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेचने और उससे राजस्व अर्जित करने की अनुमति मिल सकती है। साथ ही लगभग 25 अरब डॉलर की जमी हुई ईरानी संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी करने का प्रस्ताव भी सामने आया है।

यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की वापसी से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। भारत जैसे बड़े आयातक देशों को इसका लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।

परमाणु कार्यक्रम पर सबसे ज्यादा मतभेद

समझौते का सबसे जटिल और संवेदनशील पहलू ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। मसौदे के अनुसार ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने की प्रतिबद्धता दोहराएगा और अंतिम समझौते तक अपने परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति बनाए रखेगा। साथ ही उच्च संवर्धित यूरेनियम के निस्तारण या उसे कम संवर्धित करने की प्रक्रिया पर अगले 60 दिनों में विस्तृत बातचीत होगी।

हालांकि यहीं सबसे बड़ा विवाद भी मौजूद है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि तेहरान इसे अपनी संप्रभुता और परमाणु अधिकारों से जुड़ा विषय मानता है।

मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों पर गतिरोध

अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को मिलने वाले समर्थन पर प्रतिबंध चाहते रहे हैं। दूसरी ओर ईरान इन मुद्दों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बताते हुए बातचीत के औपचारिक एजेंडे से बाहर रखने पर अड़ा हुआ है। यही कारण है कि समझौते के मसौदे के बावजूद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

हस्ताक्षर को लेकर भी बना हुआ है संशय

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि समझौता लगभग तैयार है और जल्द ही औपचारिक रूप ले सकता है। वहीं ईरान की ओर से संकेत दिए गए हैं कि अभी कई बिंदुओं पर अंतिम सहमति नहीं बनी है। ईरानी राजनीतिक हलकों में भी प्रस्तावित समझौते को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं और कुछ कट्टरपंथी गुट इसे देश के हितों के खिलाफ बता रहे हैं।

भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

यदि समझौता सफल होता है तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने और ईरानी तेल की बाजार में वापसी से वैश्विक आपूर्ति सुधर सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, समुद्री व्यापार में स्थिरता और आयातक देशों को राहत मिलने की संभावना है। लेकिन यदि परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल नीति या क्षेत्रीय संघर्षों जैसे मुद्दों पर वार्ता विफल होती है तो तनाव दोबारा बढ़ सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार फिर अस्थिरता की चपेट में आ सकता है।

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रही कूटनीतिक कवायद पर टिकी है। प्रस्तावित समझौता यदि मूर्त रूप लेता है तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत साबित हो सकता है।

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