नेपाल का दूसरा जेन-जी संकट

नेपाल का दूसरा जेन-जी संकट

असद मिर्जा

एक सरकार गिराने के दस महीने बाद, नेपाल की जेन-जी अब उसी सरकार के सामने खड़ी है जिसे उसने खुद बनाया। एक क्रूर बेदखली अभियान, एक चालक की आत्मदाह की घटना और असहमति पर बढ़ती कार्रवाई यह परख रही है कि क्या बालेन शाह की नई राजनीति वास्तव में पुरानी राजनीति से अलग है।

नेपाल एक असहज पुनरावृत्ति का साक्षी बन रहा है। के.पी. शर्मा ओली को सत्ता से हटाने वाले युवा विद्रोह के एक वर्ष से भी कम समय बाद वही पीढ़ी फिर सड़कों पर है—इस बार उसी नेता के खिलाफ, जिसे सत्ता तक पहुंचाने में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

प्रधानमंत्री बालेंद्र (बालेन) शाह, जो रैपर, इंजीनियर और फिर मेयर से राष्ट्रीय नेता बने, मार्च 2026 में जेन-जी के समर्थन की लहर पर सवार होकर सत्ता में पहुंचे थे। अब उनके कार्यकाल का पहला बड़ा जन-आंदोलन उनके सामने खड़ा है। इस बार विवाद का केंद्र भ्रष्टाचार या सोशल मीडिया प्रतिबंध नहीं, बल्कि बुलडोजर अभियान है।

अप्रैल के अंत से काठमांडू घाटी में बागमती और अन्य नदी किनारों पर बसी झुग्गी-झोपड़ियों तथा अनियोजित बस्तियों के खिलाफ सरकार के बेदखली अभियान में 2,600 से अधिक परिवारों—करीब 15,000 लोगों—के घर ध्वस्त कर दिए गए हैं। सरकार ने इसे अतिक्रमित सार्वजनिक भूमि को मुक्त कराने की कार्रवाई बताया और शुरुआत में इसे व्यापक समर्थन भी मिला। यहां तक कि आरएसपी के चुनावी घोषणापत्र में भी उपग्रह मानचित्रण और बायोमेट्रिक सत्यापन के माध्यम से वास्तविक भूमिहीन परिवारों और अवसरवादी अतिक्रमणकारियों के बीच अंतर करने का वादा किया गया था।

लेकिन जिस बात ने व्यापक आक्रोश पैदा किया, वह नदी किनारों को खाली कराने का उद्देश्य नहीं, बल्कि उसका तरीका था—पहले बेदखली और बाद में पुनर्वास, वह भी यदि हुआ तो। लगभग 325 परिवारों को अस्थायी होल्डिंग सेंटरों में भेजा गया, जिनमें से कई बाद में बाढ़ की चपेट में आ गए। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में कीर्तिपुर शामिल रहा।

इस महीने की शुरुआत में सरकार ने इन अस्थायी आश्रयों को भी खाली करने का आदेश दे दिया, जबकि अनेक विस्थापित परिवारों का कहना था कि उनके पास जाने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं है।

जनाक्रोश तब और बढ़ गया जब एक चालक, गणेश नेपाली, ने नगर पुलिस के साथ विवाद के बाद आत्मदाह कर लिया। यह घटना अब प्रदर्शनकारियों के लिए गरीबों के प्रति राज्य की संवेदनहीनता का प्रतीक बन गई है।

संयुक्त राष्ट्रीय स्क्वाटर मोर्चा ने “गरीबों पर अत्याचार बंद करो” जैसे नारों के साथ प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। वे युवा कार्यकर्ता, जिन्होंने कभी बालेन शाह के राजनीतिक उभार का समर्थन किया था, अब उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उनकी सरकार भूमिहीनों को संवैधानिक अधिकारों वाले नागरिकों के बजाय एक प्रशासनिक समस्या के रूप में देख रही है। उनके अनुसार यह सितंबर 2025 के जेन-जी आंदोलन की जवाबदेही और समावेशन की भावना के साथ विश्वासघात है।

बालेन शाह सरकार ने इन बेदखलियों को लंबे समय से लंबित भूमि प्रबंधन प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और दावा किया है कि वास्तविक भूमिहीन परिवारों तथा लाभ के लिए सार्वजनिक या निजी भूमि पर कब्जा करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा रहा है। लेकिन नीति से अधिक आलोचना उसके क्रियान्वयन के तरीके को लेकर हो रही है।

पुलिस ने कई जेन-जी कार्यकर्ताओं—जिनमें माजिद अंसारी, सरिस्मा थापा और नेल्सन घतानी शामिल हैं—को उस समय हिरासत में लिया, जब वे बाढ़ के बाद कीर्तिपुर होल्डिंग सेंटर की स्थिति का दस्तावेजीकरण करने पहुंचे थे।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अबी नारायण काफले का कहना है कि कार्रवाई केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ की जाती है, जो पुलिस के काम में बाधा डालते हैं, अशांति फैलाते हैं या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं, जबकि वैध विरोध का सम्मान किया जाता है।

हालांकि मानवाधिकार संगठनों का दृष्टिकोण इससे अलग है। महिला मानवाधिकार रक्षक राष्ट्रीय गठबंधन ने पुलिस पर अमानवीय व्यवहार और गैरकानूनी हिरासत का आरोप लगाया है। वहीं, काठमांडू पोस्ट ने अपनी रिपोर्टों में शांतिपूर्ण असहमति को भी सुरक्षा चुनौती के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दो बार हस्तक्षेप करते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना किसी भी परिवार को होल्डिंग सेंटर से न हटाया जाए। आयोग ने नेपाल के 2018 के स्क्वाटर-आवास कानून, संविधान के अनुच्छेद 37 में निहित पर्याप्त आवास के अधिकार तथा नेपाल द्वारा अनुमोदित अंतरराष्ट्रीय संधियों का हवाला दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी बेदखली अभियान पर सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। एक मंत्री ने स्क्वाटर परिवारों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए स्वीकार किया कि उनकी स्थिति “देखना कठिन” था। यह स्वीकारोक्ति सरकार के उस दावे के साथ विरोधाभास पैदा करती है कि उसकी पूरी कार्रवाई पूरी तरह कानूनी और उचित थी।

मार्च के चुनाव में पराजित विपक्षी दलों ने इस संकट को राजनीतिक अवसर के रूप में देखा है। सीपीएन-यूएमएल के निरज आचार्य ने कहा है कि जनादेश सरकार को मनमानी करने का अधिकार नहीं देता। उन्होंने पुनर्वास पहले और बेदखली बाद में की नीति अपनाने तथा नागरिकों के खिलाफ बल प्रयोग रोकने की मांग की है।

जनता समाजवादी पार्टी के नेता महतो ने सरकार के पहले सौ दिनों को “पुराने अधिनायकवाद की गंध” वाला बताया। उन्होंने ध्वस्त बस्तियों, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कराधान तथा गणेश नेपाली की आत्मदाह की घटना को राज्य की संवेदनहीनता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।

नेपाली कांग्रेस के नेताओं, जिनमें गगन कुमार थापा और भीष्म राज आङ्देम्बे शामिल हैं, ने हिरासत में लिए गए सभी कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि सरकार का कठोर रवैया जारी रहा तो असंतोष और बढ़ सकता है।

हालांकि यहां एक स्पष्ट विडंबना भी है। यही राजनीतिक दल दशकों तक अव्यवस्थित स्क्वाटर बस्तियों की समस्या को बढ़ने देते रहे और स्वयं 2025 के जेन-जी आंदोलन के निशाने पर थे।

असल समस्या सरकार की मंशा से अधिक उसकी प्राथमिकताओं और कार्यान्वयन के क्रम की है। नेपाल का संविधान, 2018 का स्क्वाटर-अधिकार कानून और सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णय एक ही सिद्धांत पर बल देते हैं—बेदखली से पहले वैकल्पिक आवास और आजीविका की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

यदि सरकार इस संकट से बाहर निकलना चाहती है तो उसे आगे की सभी बेदखलियों पर तब तक रोक लगानी होगी, जब तक सुरक्षित और स्थायी पुनर्वास स्थल तैयार न हो जाएं। साथ ही, भूमि संबंधी समस्या समाधान आयोग के माध्यम से वास्तविक भूमिहीन परिवारों की वैज्ञानिक पहचान की प्रक्रिया पूरी करनी होगी, न कि केवल बुलडोजर आधारित कार्रवाई के जरिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बालेन शाह सरकार को यह समझना होगा कि जेन-जी की मूल मांग केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी। युवा पीढ़ी ऐसी संस्थाओं की अपेक्षा कर रही थी जो नागरिकों, विशेषकर सबसे गरीब और कमजोर वर्गों, के साथ कानूनसम्मत, मानवीय और न्यायपूर्ण व्यवहार करें।

यदि सरकार इस कसौटी पर खरा उतरने में विफल रहती है, तो नेपाल की अब तक की सबसे युवा सरकार स्वयं इस बात का उदाहरण बन सकती है कि परिवर्तन के नाम पर सत्ता में आए आंदोलन कितनी जल्दी उन्हीं प्रवृत्तियों को अपना लेते हैं, जिनके विरुद्ध कभी उन्होंने संघर्ष किया था।

(लेखक अंतरराष्ट्रीय, रक्षा और रणनीतिक मामलों के नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ समीक्षक हैं।)

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