सिलैक्टिव आक्रोश से कांग्रेस का इतिहास नहीं मिट सकता

आर.पी. सिंह

गाजा पर सोनिया गांधी का लेख नैतिकता का पाठ नहीं, बल्कि चयनात्मक आक्रोश का एक जीवंत उदाहरण है। भारत को मानवाधिकारों का उपदेश देने से पहले कांग्रेस नेतृत्व को स्वतंत्र भारत के सबसे काले अध्यायों में से एक, 1984 के सिख विरोधी नरसंहार और उसके बाद पंजाब में वर्षों तक चले दर्द और पीड़ा का जवाब देना चाहिए।

नवंबर 1984 में हजारों निर्दोष सिखों की निर्मम हत्या कर दी गई। लोगों को उनके घरों से घसीटकर बाहर निकाला गया, लोहे के सरियों से पीटा गया, उन पर मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया गया। पूरे के पूरे परिवार समाप्त कर दिए गए। गुरुद्वारों का अपमान किया गया, घरों और दुकानों को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया। बच्चों ने अपने पिता को भीड़ द्वारा मारते हुए देखा, माताओं ने अपने बेटों को अपनी आंखों के सामने मरते देखा। हजारों महिलाएं एक ही रात में विधवा हो गईं और अनेक जीवित बचे लोगों ने भयावह यौन हिंसा की ऐसी कहानियां सुनाईं, जिनके शारीरिक और मानसिक घाव आज तक नहीं भरे हैं।

गाजा के लिए आंसू बहाने से पहले सोनिया गांधी स्वयं से एक प्रश्न पूछें—क्या उन्होंने कभी सतनामी बाई के आंसू पोंछने की कोशिश की है? सतनामी बाई की गवाही 1984 के सिख विरोधी नरसंहार की सबसे हृदयविदारक गवाहियों में से एक है। 1 नवंबर, 1984 को त्रिलोकपुरी में उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पति मोहन सिंह, जो एक गरीब ऑटो-रिक्शा चालक थे, को लोहे के सरियों से पीट-पीटकर और जिंदा जलाकर मार डाले जाते देखा, जबकि उनकी गोद में उनकी नवजात बेटी थी।

उस समय, जब कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी, उन्होंने और अनेक अन्य सिख महिलाओं ने बाद में भीड़ द्वारा किए गए भयावह यौन अत्याचारों का वर्णन किया। उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। क्या सोनिया गांधी ने कभी सार्वजनिक रूप से सतनामी बाई का नाम लिया? क्या वह कभी उनसे मिलीं, उन्हें गले लगाया या 1984 में सिख महिलाओं पर हुए अकल्पनीय अत्याचारों पर गहरा दुख व्यक्त किया? क्या उन्होंने कभी प्रत्येक पीड़ित को पूर्ण न्याय दिलाने की मांग की?

दिल्ली में यह भयावहता समाप्त नहीं हुई। इसके बाद पंजाब वर्षों तक खून से लथपथ रहा। एक पूरी पीढ़ी आतंकवाद और आतंकवाद-रोधी अभियानों के बीच बड़ी हुई। हजारों परिवार अपने उन बेटों की तलाश करते रहे, जो कभी वापस नहीं लौटे। जबरन गायब किए जाने, अवैध अंतिम संस्कार, हिरासत में यातना और फर्जी मुठभेड़ों के आरोपों ने पंजाब के इतिहास पर गहरे घाव छोड़े। जत्थेदार गुरदेव सिंह कौंके की हिरासत में हत्या आज भी उस दौर के सबसे दर्दनाक प्रतीकों में से एक है।

भारत के सबसे राष्ट्रवादी और देशभक्त समुदायों में से एक, सिख समुदाय, जिसने देश की आजादी, एकता और सुरक्षा के लिए अतुलनीय बलिदान दिए, उसे आतंकवादियों की करतूतों के कारण संदेह की दृष्टि से देखा गया। जिस समुदाय ने भारत को अनगिनत शहीद दिए, उसी समुदाय को ऐसे बोझ का सामना करना पड़ा, जिसका वह कभी दोषी नहीं था।

सोनिया गांधी को अपने दिवंगत पति राजीव गांधी का वह बयान भी याद रखना चाहिए, जो उन्होंने 1984 की हिंसा के बाद दिया था—“जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।” इस बयान की व्यापक रूप से आलोचना हुई, क्योंकि इसे उस भीषण हिंसा को उचित ठहराने या उसकी गंभीरता को कम करके दिखाने के रूप में देखा गया।

असंख्य सिख परिवारों के लिए यह बयान कांग्रेस की उस विफलता का प्रतीक बन गया, जिसमें उसने पीड़ितों के साथ बिना किसी शर्त के खड़े होने का नैतिक साहस नहीं दिखाया। नरसंहार के बाद भी कांग्रेस की राजनीतिक भाषा और उसके कुछ चुनावी विज्ञापन, जिन्हें अनेक सिखों ने समुदाय को राष्ट्रीय सुरक्षा और भय के चश्मे से देखने का प्रयास माना, ने घाव भरने की बजाय अलगाव की भावना को और गहरा किया।

और आज वही सोनिया गांधी गाजा के मुद्दे पर नैतिकता का सर्वोच्च मंच ग्रहण करने का प्रयास कर रही हैं।

हर निर्दोष नागरिक का जीवन—चाहे वह फिलिस्तीनी हो, इसराइली, भारतीय या किसी भी अन्य देश का नागरिक—अनमोल है। भारत ने हमेशा मानवीय सहायता, निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा और संवाद के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। लेकिन नैतिक विश्वसनीयता के लिए निरंतरता आवश्यक है।

भारत को मानवता का पाठ पढ़ाने से पहले सोनिया गांधी को यह जवाब देना चाहिए कि उन्होंने दिल्ली की सिख विधवाओं, 1984 के अनाथ बच्चों, दशकों तक न्याय की प्रतीक्षा करने वाले परिवारों और पंजाब के पीड़ितों के लिए कभी वही नैतिक संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई, जो आज गाजा के लिए प्रदर्शित कर रही हैं।

यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि यह लेख सार्वभौमिक मानवाधिकारों से अधिक भारत की घरेलू राजनीति से प्रेरित है। बहुत से लोग इसे भारत में मुस्लिम मतदाताओं को संदेश देने का प्रयास मानेंगे, जबकि कांग्रेस अब भी अपने इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों का पूरी ईमानदारी से सामना करने से बच रही है।

इतिहास सिलैक्टिव नहीं हो सकता। मानवाधिकार सिलैक्टिव नहीं हो सकते। करुणा भी सिलैक्टिव नहीं हो सकती।

(राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा)

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