सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ अखबार दिखाने लगे हैं हिम्मत

अनिल जैन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अब तक के 12 साल के शासन में ऐसा पहली बार हो रहा है कि उनकी सरकार और उसकी भारतीय जनता पार्टी के लोगों से जुड़े भ्रष्ट कारनामों की खबरें उन अखबारों में छप रही हैं, जिन्होंने अब तक ऐसी खबरें छापने से परहेज बरत रखा था। किसी भी दिन का अखबार खोलिए तो भाजपा नेताओं के घोटालों की खबरें दिखेंगी। अखबारों के रवैये में अचानक आया यह बदलाव हैरान करने वाला है।

हालांकि, टेलीविजन चैनल अभी सरकार के “अनुशासित बच्चे” बने हुए हैं। भ्रष्टाचार की जो खबरें अखबारों में प्रमुखता से छप रही हैं, उनका जिक्र टीवी चैनलों पर नदारद है। टीवी चैनल अगर दिखा भी रहे हैं तो अखबारों में छप रही खबरों पर सरकार और भाजपा के नेताओं की वे प्रतिक्रियाएं, जिनमें भ्रष्टाचार की खबरों को गलत बताया जा रहा है।

मोदी ने 2013 में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनने के बाद देशव्यापी दौरा करते हुए जो प्रचार अभियान छेड़ा था, उसका केंद्रीय मुद्दा कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार का कथित भ्रष्टाचार ही था। मोदी ए टू जेड घोटालों की चर्चा करते हुए कहते थे कि, “कांग्रेस के राज में आकाश से लेकर पाताल तक घोटाले हुए हैं।” उसी दौरान उन्होंने यह लोक-लुभावन जुमला भी उछाला था—”न खाऊंगा और न खाने दूंगा।” प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने इस वादे को दोहराया।

यह अलग बात है कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार से जरा भी अछूती नहीं रही। शायद ही कोई मंत्रालय ऐसा रहा हो, जिसके किसी भी काम में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार नहीं हुआ हो। कई मामले तो प्रधानमंत्री की नाक के नीचे हुए और कई मामलों को अंजाम देने में खुद मोदी की अहम भूमिका रही। भाजपा शासित राज्य सरकारों का भी यही हाल रहा।

मगर मोदी ने सत्ता में आते ही ऐसा इंतजाम कर दिया था कि मीडिया में भाजपा सरकारों के भ्रष्टाचार का जिक्र न हो। सो, मीडिया ने न सिर्फ सरकार के भ्रष्टाचार की ओर से मुंह फेर लिया, बल्कि सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर उसका बचाव भी करने लगा। कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण से मुक्त जिन छोटे मीडिया समूहों ने सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर भी किया, तो सरकार ने अपनी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर उनका मुंह बंद करने की कोशिश की। इस काम में सरकार को कुछ हद तक न्यायपालिका का भी सहयोग मिला।

बहरहाल, पिछले कुछ दिनों से जिधर देखो, उधर से हजारों करोड़ रुपये के घोटालों की खबरें आ रही हैं। खास बात यह है कि सभी खबरें भाजपा शासित राज्यों से आ रही हैं और सभी के केंद्र में भाजपा और आरएसएस के बड़े नाम हैं। हैरानी की बात यह भी है कि अखबारों में जो मामले आ रहे हैं, उनमें साफ-साफ दिख रहा है कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन मोदी ने एक भी मामले में अपना मुंह नहीं खोला है। व्यक्ति का चरित्र निर्माण करने का दावा करने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत भी घोटालों में अपने वरिष्ठ स्वयंसेवकों के नाम आने पर खामोश बने हुए हैं।

इस समय जो घोटाले सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें एक अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला है और दूसरा मध्य प्रदेश के उज्जैन में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवारजनों द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने का मामला है।

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में कितने करोड़ रुपये का चढ़ावा चोरी हुआ, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन 200 करोड़ रुपये की नकदी और सोने के कुछ आभूषण बरामद होने की खबर आई है। चोरी का आंकड़ा आठ करोड़ से लेकर कई सौ करोड़ रुपये तक का बताया जा रहा है। हीरे-जवाहरात जड़ी रामशिलाएं, चांदी की दो सौ से ज्यादा ईंटें और चांदी का कागभुसुंडी गायब होने की खबरें भी हैं। मंदिर निर्माण के समय भी जमीनों की खरीद और निर्माण सामग्री में भारी पैमाने पर गड़बड़ी होने की खबरें आ रही हैं।

करीब एक महीने पहले जब पहली बार मंदिर का चढ़ावा चोरी होने की खबर आई थी, तब मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों और भाजपा प्रवक्ताओं ने इन खबरों को सनातन को बदनाम करने और रामभक्तों की आस्था का अपमान करने की साजिश करार देते हुए खारिज करने की कोशिश की थी, लेकिन उनका पैंतरा काम नहीं आया, क्योंकि एक के बाद एक सबूत सामने आते गए और यह साबित हो गया कि बड़े पैमाने पर चोरी हुई है और उसके तार बड़े लोगों से जुड़े हुए हैं।

कई सारे सबूत और गवाह सामने आने के बाद जब मामले को दबाना असंभव हो गया, तो राज्य सरकार को भी मजबूरी में मुकदमा दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार करना पड़ा। इस सिलसिले में राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के सचिव चंपत राय का अपने पद से इस्तीफा देने, मामले में मुकदमा दर्ज होने और आठ लोगों की गिरफ्तारी के साथ ही इस बात की पुष्टि हो गई कि राम मंदिर में करोड़ों रुपये की चढ़ावा चोरी हुई है। यह मंदिर की पवित्रता को कलंकित करने वाला ऐसा कांड है, जिससे करोड़ों हिंदू श्रद्धालु खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। चढ़ावे में हेराफेरी को केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का मामला नहीं माना जा सकता, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ घोर विश्वासघात भी है।

उधर, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके परिवार की जमीन खरीद का मामला अलग तूल पकड़ रहा है। भाजपा नेताओं की यह दलील काम नहीं आ रही है कि मुख्यमंत्री का परिवार पहले से रियल एस्टेट के कारोबार में है या कांग्रेस के भी कई नेता रियल एस्टेट के कारोबारी हैं। पूछा जा रहा है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव और उनके परिजनों ने 168 एकड़ जमीन उन्हीं इलाकों में कैसे खरीदी, जहां सरकारी विकास की बड़ी परियोजनाएं आने वाली थीं या हैं, हाईवे बनने वाले थे या भूमि उपयोग (लैंड यूज) बदला जाना था?

ऐसा नहीं है कि मध्य प्रदेश के पत्रकारों को यह सब जानकारी नहीं थी, लेकिन वहां यह रवायत बन चुकी है कि मुख्यमंत्री कोई भी हो, वह पद से हटने तक अखबारों के लिए यशस्वी और कर्मठ ही होता है। इसलिए मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवारजनों द्वारा जमीनें खरीदने का मामला दिल्ली से प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस में छपा।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अलावा हरियाणा, गुजरात, बिहार, दिल्ली—कोई भी राज्य अछूता नहीं है। हरियाणा इन दिनों आईडीएफसी बैंक घोटाले में फंसा हुआ है। आईएएस अधिकारी पंकज अग्रवाल गिरफ्तार हुए हैं। आरोप है कि 170 करोड़ रुपये का सरकारी फंड आईडीएफसी बैंक में ट्रांसफर किया गया और वहां से पैसे फर्जी खातों के जरिए निकाल लिए गए।

राजधानी दिल्ली में सेंट्रल प्रोक्योरमेंट कमेटी में साढ़े छह सौ करोड़ रुपये के घोटाले की जांच शुरू हुई है। मेडिकल उपकरण खरीदने में यह घोटाला हुआ है। राजेश एक्सपोर्ट का 15 लाख करोड़ रुपये का फर्जी कारोबार दिखाकर किए गए घोटाले की जांच भी अब शुरू हो गई है।

बिहार में रिशु श्री घोटाला चर्चा में है। कई आईएएस अधिकारी इसमें फंसे हैं। दो आईएएस अधिकारियों के यहां छापे पड़े हैं, जिन्हें निलंबित किया गया है और एक अधिकारी फरार है। गिरफ्तार रिशु श्री के मोबाइल से सरकार के गोपनीय दस्तावेज मिल रहे हैं। कैबिनेट नोटिंग्स मिल रही हैं। मंजूरी से पहले ही कैबिनेट की फाइल उसके पास पहुंचने की जानकारी सामने आ रही है। वह हजारों करोड़ रुपये के टेंडर मैनेज करता था। नीतीश कुमार की सरकार के समय बहुत अहम मंत्रालयों में रहे आईएएस अधिकारी उसके लिए काम करते थे। मंत्रियों की मिलीभगत का खुलासा भी अभी होना है।

इन सबके अलावा केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती के लिए अपने ही मंत्रालय से 99 लाख रुपये की सब्सिडी मिलने का मामला भी मीडिया के जरिए ही उजागर हुआ है।

जो भी हो, सरकारों के भ्रष्टाचार को लेकर अखबारों के रवैये में आया बदलाव देश में बदल रहे राजनीतिक वातावरण का संकेत है। देखने वाली बात होगी कि सरकार अखबारों के इस रवैये को कब तक बर्दाश्त करती है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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