ईरान परमाणु बम के कितना करीब था?

“ईरान युद्ध तभी समाप्त करेगा, जब वह स्वयं ऐसा चाहेगा और जब उसकी शर्तें पूरी होंगी।”

मनीष तिवारी

जब अमरीका और इसराईल ने जून 2025 में और फिर से फरवरी 2026 के बाद से ईरान पर बमबारी करने का फैसला किया, तब क्या ईरान परमाणु बम बनाने के करीब था? क्या यह एक और छलावा था, जैसा कि मध्य पूर्व में संयुक्त राज्य अमरीका के प्रताडित और जटिल इतिहास तथा 1948 से इस क्षेत्र में इसराईल के अंतहीन युद्धों के दौरान पहले भी अनगिनत बार हो चुका है। इसके विपरीत, क्या यह एक ऐसी अमंगलकारी स्थिति को शुरुआत में ही कुचलने और पहले से ही प्रतिबंधित करने का प्रयास था, जो आने वाले निकट भविष्य में खतरनाक रूप से प्रकट हो सकती थी?

अमरीका- इसराईल हमले के 11 दिन बाद ेबपमदजपपिबंउमतपबंद.बवउ वैबसाइट पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में, ‘जेम्स मार्टिन सैंटर फॉर नॉन-प्रोलिफरेशन स्टडीज’ के निदेशक और ‘मिडलबरी इंस्टीच्यूट ऑफ इंटरनैशनल स्टडीज’ के प्रोफैसर जैफरी लुईस के हवाले से कहा गया था कि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि ईरान परमाणु हथियार के करीब था। उनके इन अवलोकनों का अन्य स्वतंत्र विशेषज्ञों ने भी समर्थन किया था। ये आकलन व्यापक रूप से जून 2025 में ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजैंसी’ (आई.ए.ई.ए.) के पिछले निर्धारण के अनुरूप हैं। ईरानी परमाणु पहेली पर ओपन-सोर्स रिपोर्टिंग के अनुसार, अमरीकी खुफिया एजैंसियों के समय-समय पर आने वाले अनुमानों ने भी इन आकलनों पर सहमति जताई थी।

जून 2025 के आई.ए.ई.ए. के एक अनुमान ने संकेत दिया था कि ईरान के पास 441 किलोग्राम (60 प्रतिशत) संवर्धित यूरेनियम था, जहां प्रतिशत का तात्पर्य सामग्री में पाए जाने वाले आइसोटोप यूरेनियम 235 की हिस्सेदारी से है।

इतिहास पर थोड़ा पीछे नजर डालें तो, ईरान 1957 से अमरीकी राष्ट्रपति आइजनहावर के ‘एटम्स फॉर पीस’ कार्यक्रम की बदौलत परमाणु खोज में लगा हुआ है। यह उस दौर की बात है जब शाह रजा मोहम्मद पहलवी के शासनकाल के दौरान ईरान अमरीका का सहयोगी था। 1979 की इस्लामी क्रांति में शाह का तख्तापलट कर दिया गया और अगले वर्ष 22 सितंबर 1980 को सद्दाम हुसैन के शासन वाले ईराक ने ईरान पर आक्रमण कर दिया।

अगले दशक के दौरान, ईरानी रणनीतिक विचारकों की एक पूरी पीढ़ी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण रणनीतिक सबक को अपने भीतर समाहित कर लिया, क्योंकि पश्चिम ने ईराक को हथियारों की आपूर्ति की और संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.) सहित वैश्विक संगठनों ने तब आंखें मूंद लीं जब सद्दाम हुसैन ने ईरानी सैनिकों और नागरिकों पर रासायनिक और अन्य परिष्कृत हथियारों का इस्तेमाल किया। सीख यह थी कि जब तक ईरान के पास परमाणु हथियारों की कमी रहेगी, पड़ोस का कोई भी तानाशाह या दूर बैठा कोई वर्चस्ववादी उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर सकता है। इस प्रकार रणनीतिक स्वायत्तता और एक विश्वसनीय निवारक क्षमता हासिल करने के लिए परमाणु हथियारों की ओर ईरान का गुप्त मार्च शुरू हुआ।

यहीं पर पाकिस्तान का कनैक्शन सामने आया। ए.क्यू. खान, जो ‘परमाणु प्रसार के वॉलमार्ट’ पर राज करते थे, ने ईरान को परमाणु सामग्री की आपूर्ति शुरू कर दी। इस पाकिस्तानी-ईरानी परमाणु संबंधों को तत्कालीन पाकिस्तानी सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक और उनके सैन्य उत्तराधिकारियों की सहमति और आशीर्वाद प्राप्त था-इस तथ्य की पुष्टि 2015 में पूर्व ईरानी राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी ने सार्वजनिक रूप से की थी।

पाकिस्तानी सेना ने बदले में इस घटनाक्रम के बारे में क्रमिक नागरिक सरकारों को सफलतापूर्वक अंधेरे में रखा। प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को 1989 में तेहरान की यात्रा के दौरान दुर्घटनावश इसका पता तब चला जब रफसंजानी ने उनसे ‘विशेष रक्षा मामलों’ पर दोनों देशों के बीच हुए समझौते की पुष्टि करने के लिए कहा। उस समय तक दर्जनों ईरानी वैज्ञानिक पाकिस्तान के विभिन्न संस्थानों में प्रशिक्षित हो चुके थे।

14 अगस्त 2002 को, ईरानी असंतुष्ट समूहों के एक छत्र संगठन ‘नैशनल काऊंसिल ऑफ रेसिस्टैंस ऑफ ईरान’ ने दो परमाणु स्थलों को सार्वजनिक कर दिया जिन्हें ईरान ने कथित तौर पर आई.ए.ई.ए. से छुपाया था, जिससे ईरानी परमाणु क्षमता को सीमित करने का एक बारहमासी प्रयास शुरू हो गया। मौजूदा दौर इसी गाथा का ताजा अध्याय है।

हालांकि, यह अभी भी पहले पूछे गए सवाल का जवाब नहीं देता है-कि ईरान वास्तव में एक विमान से गिराए जाने या मिसाइल डिलीवरी सिस्टम से जोड़े जाने में सक्षम एक व्यावहारिक परमाणु उपकरण से कितने ‘स्क्रू टर्न’ और कितने महीने या साल दूर है।

दो साल पहले 7 अक्तूबर 2001 को, अमरीका ने 9/11 के आतंकवादी हमले के लिए अल कायदा को दंडित करने और ओसामा बिन लाडेन व उसके सहयोगियों को शरण देने के लिए तालिबान को सजा देने हेतु अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था। यह ध्यान देने योग्य है कि 9/11 के 19 आतंकवादी अपहरणकर्त्ताओं में से 15 सऊदी अरब से थे, दो यू.ए.ई. से, एक लेबनान से और नेता मिस्र से था। अफगानिस्तान या उस मामले में ईराक से कोई नहीं था।

सऊदी अरब, यू.ए.ई. और मिस्र मध्य पूर्व में अमरीका के सबसे पक्के सहयोगियों में बने हुए हैं। ओसामा बिन लाडेन को आखिरकार ऐबटाबाद में खत्म कर दिया गया, लेकिन उसे पनाह देने वाला पाकिस्तान एक बार फिर अमरीका के नए स्नेह की चमक का आनंद ले रहा है। आज वह अमरीका- इसराईल और ईरान के बीच मध्यस्थ है।

विडंबना यह है कि अमरीका ने 2021 में अफगानिस्तान को उसी तालिबान के हाथों में वापस सौंप दिया, जिसको उसने 2001 में अफगानिस्तान से बाहर खदेड़ा था।

यह सब एक स्पष्ट सवाल खड़ा करता है कि क्या ईरान पर अमरीका- इसराईल के हमले के पीछे ‘परमाणु हथियारों’ के अलावा कोई अन्य गुप्त कारण था।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *