नई दिल्ली, 19 मई 2026। यशवंत वर्मा के खिलाफ कथित नकदी बरामदगी मामले की जांच कर रही समिति ने अपनी रिपोर्ट ओम बिरला को सौंप दी है। लोकसभा सचिवालय ने बताया कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत तैयार की गई यह रिपोर्ट उचित समय पर संसद के दोनों सदनों में पेश की जाएगी।
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लगने के बाद कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी। उस समय वह दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। बाद में उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति ने अपनी जांच में कहा था कि जिस भंडारगृह से कथित नकदी मिली, उस पर न्यायमूर्ति वर्मा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि, संसद में संभावित बर्खास्तगी की कार्यवाही से पहले ही न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय के पूर्व फैसलों के मुताबिक किसी न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने और उसकी प्रति सार्वजनिक करने के बाद उसे प्रभावी माना जाता है। ऐसे इस्तीफे के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक नहीं होती, हालांकि औपचारिक अधिसूचना बाद में जारी की जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस्तीफे के बाद न्यायमूर्ति वर्मा अब एक सामान्य नागरिक माने जाएंगे, इसलिए संसद द्वारा उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर कानूनी स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
फिलहाल जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है और अब इस पर संसद में आगे क्या निर्णय लिया जाएगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
