बदला छूटा पीछे, बदलाव आया सामने

अरविन्द मोहन…..

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात से असहमत होना मुश्किल है कि इस बार के विधान सभा चुनाव बदला के लिए नहीं बदलाव के लिए हुए थे और बदलाव हुआ है और यह भी कहा जा सकता है कि बदलाव के नायकों में खुद नरेंद्र मोदी और उनके सबसे भरोसेमंद बन चुके अमित शाह का नंबर सबसे ऊपर है। बदलाव तमिलनाडु में भी हुआ है और केरलम में भी। लेकिन बंगाल का बदलाव सबसे आगे है। असम में बदलाव नहीं हुआ तब भी वहां के नतीजे इसी बड़ी कहानी के साथ चलते हैं और वहां और कुछ नहीं तो अमित शाह और हेमंत बिस्व सरमा की जोड़ी ने कांग्रेस को ही काफी बदल दिया। इस बदलाव की जो और जैसी तैयारी मोदी शाह ने की थी और जिस तरह से उसे लागू किया उसके कई पक्षों की आलोचना हो सकती है लेकिन उससे ज्यादा आलोचना का पात्र विपक्ष रहा। सब कुछ देखकर पूरा का पूरा विपक्ष जिस तरह से चुनावी तैयारी से आंखें फेरे रहा और सिर्फ बदला की दिशा में कुछ काम हुए।

जाहिर तौर पर मतदाताओं ने उसे नापसंद किया और मोदी-शाह के कदमों को शक-सुबहे के बावजूद स्वीकार किया। चुनाव परिणामों के बाद भाजपा की ताकत अपने शिखर पर पहुंची लगती है तो ममता बनर्जी, एम के स्टालिन और पिनराई विजयन जैसे तीन दिग्गज विपक्षी नेताओं की ढोल बाजे के साथ विदाई विपक्ष की राजनीति के लिए बड़ा झटका है। दो साल से भी कम अवधि में भाजपा ने लोक सभा चुनाव के झटके से उबरकर यह बड़ी सफलता पाई है। तब अपने दम पर बहुमत से दूर रह गई भाजपा ने अपने सांसदों से मोदी जी को नेता चुनवाने की जगह सीधे एनडीए सांसदों की बैठक में नेता का चुनाव कराना आसान माना क्योंकि उसे अपनी पार्टी के अंदर से मोदी-शाह-नड्डा के नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने की आशंका थी। आज पार्टी के अंदर के विरोधियों या असहमतों की कौन कहे?

विपक्ष का कोई नेता भी मोदी शाह के नेतृत्व को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। लोक सभा चुनाव के बाद अगर भाजपा का झंडा बुलंदी की तरफ गया है तो विपक्ष का गठबंधन बिखरा है, उसके नामलेवा मुश्किल से मिल रहे हैं। तमिलनाडु में काफी सिरफुटौव्वल के बाद इंडिया गठबंधन के दल साथ रहे लेकिन स्टालिन और राहुल गांधी के साथ प्रचार करना भी गवारा नहीं हुआ। कल नतीजे आने पर काफी सारे राजनैतिक पंडित यह हिसाब बताते दिखे कि अगर बंगाल में विपक्षी वोट को जोड़ लें तो वह भाजपा से काफी ज्यादा हो जाता है और कांग्रेस तथा तृणमूल का वोट भी भाजपा के बराबर पहुंच जाता है। लेकिन हमने ममता को सिर्फ भाजपा से ही श्बदला्य लेते हुए देखा,उनको इंडिया गठबंधन या कोई दूसरी राजनीति याद नहीं आई। पंद्रह साल के शासन और खास तौर से भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजी नाराजगी को ढंकने के लिए ममता एक रणनीति के तहत ही बदला की बात करती थीं और उन्होंने मतदाता सूची के पुनरीक्षण के सवाल को ऊपर कर के यह बदला लेने की सोची। उनकी सरकार के और उनके लोगों के काम किसी को नहीं बिसरे और न भाजपा ने बिसारने दिया। बीच चुनाव में सामने आए हुमायूं कबीर को हजार करोड़ की पेशकश को मुद्दा बनाना किसी को याद नहीं रहा लेकिन बरसों पहले के बलात्कार और भ्रष्टाचार के मामले चुनाव में मुद्दा बने।

असम में विधान सभा सीटों का पुनर्गठन याद रहा लेकिन भ्रष्टाचार के मामले से लेकर जुबीन गर्ग की मौत के मामले को भुला दिया गया। एक नेता पर ऐसी निर्भरता दिखाई गई कि सारे कद्दावर लोग भाग गए तब भी किसी को सुध नहीं आई। केरल का बदलाव उतना बड़ा न हो पर उसमें भी वाम दलों की सरकार का भ्रष्टाचार और पिनराई की कार्यशैली नए बदलाव की जरूरत पैदा की। असल में यह केरल की राजनीति में हर बार बदलाव का एक रुका हुआ क्रम था जो इस बार वापस आया है और भले ही कांग्रेस को एक राज्य मिल गया है लेकिन इससे कांग्रेस को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। अब उसे तमिलनाडु की अपनी भूल पर पछतावा हो रहा होगा जो द्रमुक का साथ छोड़ने और दलपति विजय के साथ चुनाव लड़ने का न्यौता ठुकराने से जुड़ा है।

बंगाल का बदलाव ज्यादा चर्चा पा रहा है लेकिन बिना किसी ज्यादा शोर-शराबे के तमिलनाडु जैसे राज्य में पचास साल बाद एक निर्णायक राजनैतिक बदलाव ला देना हर किसी को हैरान करने के लिए काफी था। बहुत ही अपरंपरागत तरीके से विजय ने यह जीत हासिल की है। इसमें लूट और भ्रष्टाचार के साथ परिवार की राजनीति को ठुकराने का तत्व था लेकिन तमिलनाडु की अब तक चली राजनीति से रिश्ता खत्म करना नहीं था। द्रमुक से श्राजनैतिक विरोधश् और भाजपा से श्वैचारिक विरोध्य की समांतर लाइन में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के दल आते थे और अभी भी सरकार बनाने के क्रम में आएंगे लेकिन राहुल गांधी सहित सारे लोग स्टालिन के चमत्कार पर निर्भर रहे। विजय ने नये वायदों और नए वोटरों के साथ चुनाव जीतकर तमिलनाडु की राजनीति को बदला है और एक निरन्तरता भी दी है। सत्ता का बदलाव तो हो चुका लेकिन फिल्मी स्टाइल और कार्यपद्धति क्या करती है? देखना बाकी है। पुड्डुचेरी के रामास्वामी उस्ताद नेता है और जब भाजपा राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्यों के जरिए पिछली बार सरकार बदलवाने में सफल रही तो इस बार तो वहां कोई चुनौती ही नहीं थी।

मुल्क की राजनीति में एक मामले में यह बड़ा बदलाव खतरनाक है। आज दक्षिण के सारे राज्य भाजपा के प्रभाव से दूर हुए हैं। केरलम में सीट भले तीन हो गई हो लेकिन भाजपा के वोट घटे हैं। तमिलनाडु में भी उसकी स्थिति बदतर हुई है और महिला आरक्षण के साथ लोक सभा सीटों के पुनर्गठन का काम जिस तरह सिर पर लटका है उसमें यह विभाजन खतरनाक रूप ले सकता है। इस बारे में चुनावी हंगामे के बीच लाए बिल पर संसद में क्या कुछ हुआ वह इसी खतरे की तरफ इशारा करता है। वह बिल भी बंगाल समेत अन्य जगहों की महिलाओं को लुभाने के लिए अचानक लाया गया था। तो एक तरफ भाजपा है जो हर स्तर की तैयारी, हर मसले के चुनावी लाभ घाटे को ध्यान में रखकर और पूरा नैरेटिव गढ़कर मैदान में उतरती है दूसरी तरफ लगभग सारा विपक्ष है जो दरवाजे पर बारात लगने के समय इंतजाम शुरू करता है या दोष देकर हंगामा करता है। चुनावी राजनीति में हैं और चुनाव लड़ना है तो उसकी तैयारी जरूरी है और यह चीज कहीं और से नहीं तो भाजपा से सीखी जा सकती है। सत्ता ने उसे ने हथियार और ताकत भी उपलब्ध कराये हैं।

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