सर्वमित्रा सुरजन….
प. बंगाल में बीजेपी का परिवर्तन निर्दोषों के खून से लिखा जा रहा है। यह गंभीर आरोप तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर लगाया है। दरअसल चार मई को जैसे-जैसे भाजपा के पक्ष में नतीजे आते गए और यह तय होने लगा कि अब प.बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की सत्ता जा रही है, ममता बनर्जी का शासन खत्म हो रहा है, भाजपा समर्थकों का उत्साह बढ़ने लगा। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि भाजपा ने इस दिन के लिए 15 साल लंबा इंतजार भी किया है। पिछले दो बार के चुनावों में भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने कई-कई दिन तक सभाएं कीं, अपने तमाम दिग्गज नेताओं को चुनाव प्रचार में उतारा, फिर भी सफलता हाथ नहीं आई। इस बार भी सब तरह के तरीके भाजपा ने आजमाए और आखिर में जब वो विजेता घोषित हुई तो उसके समर्थकों की खुशी जायज है। लेकिन क्या यह खुशी भाजपा की जीत से ज्यादा टीएमसी की हार की है। क्योंकि खुशी बांटने का तरीका तोड़-फोड़ या हिंसक व्यवहार प्रदर्शन से तो नहीं होता है।
दूसरे को तकलीफ पहुंचा कर जिन्हें खुशी मिलती है, उसके लिए संस्कृतनिष्ठ हिंदी में एक शब्द है परपीड़क सुख। यह एक किस्म का मनोविकार है। क्योंकि आम तौर पर व्यक्ति तब हिंसक होता है, जब उसे खुद पर किसी किस्म का खतरा दिखाई देता है। आत्मरक्षा में वह भी हिंसा का सहारा लेता है या उसे किसी बात पर इतना गुस्सा आ जाता है कि वह खुद पर काबू नहीं रख पाता और हिंसक हो जाता है। लेकिन गुस्सा शांत होते ही सामान्य व्यक्ति को अपनी हिंसा पर पछतावा भी होता है। लेकिन जिन लोगों में परपीड़क सुख का व्यक्तित्व विकार होता है, वे दूसरों को चोट पहुंचाने में आनंद का अनुभव करते हैं, उन्हें न पछतावा होता है, न पश्चाताप। इस विकार के मुख्य घटकों में नुकसान पहुंचाने का इरादा, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने में आनंद प्राप्त करना और पश्चाताप का अभाव शामिल हैं।
ऐसी विकृति के शिकार लोगों के कुछ खास लक्षण भी मनोविज्ञान में बताए गए हैं। जैसे वे बेहद असुरक्षित, कायर होते हैं, खतरे से डरते हैं और बहादुर होने का दिखावा करते हैं। वे अमानवीय प्रकृति के होते हैं, हिंसक होते हैं। अपनी दुर्भावनाओं का नाटकीय चित्रण करते हैं। दबी हुई निराशा या अपमान की भावनाओं को बाहर निकालने के लिए आक्रामकता का उपयोग करते हैं। ये सारे लक्षण इस समय बंगाल की सड़कों पर भाजपा की जीत की खुशी मनाते कई लोगों में, खासकर पुरुषों में देखे जा सकते हैं। कुछ भयावह वीडियो सामने आए हैं, जिनसे इस बात को कुछ और स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है। एक वीडियो में नरेन्द्र मोदी की शक्ल का मास्क लगाकर एक आदमी, एक महिला को रस्सी से बांध कर खींच रहा है, जिसने सफेद और नीली साड़ी पहनी है। महिला को ममता बनर्जी की तरह दिखाने की कोशिश की गई है। इस महिला का जुलूस निकाला जा रहा है और उसमें भाजपा के झंडे के साथ कई आदमी और औरतें चल रही हैं।
एक और वीडियो में एक आदमी को ममता बनर्जी जैसी साड़ी और हुलिए में दिखाकर जय श्रीराम के नारे लगाए जा रहे हैं, उस व्यक्ति को भी बांध कर जुलूस निकाला जा रहा है और उस पर चप्पल भी बरसाई जा रही है। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने इस पर टिप्पणी की है मोदी जी के नाम पर, सारे मवाली मैदान में। मोदी मास्क लगा कर महिला को रस्से से बांध कर खींचने वाला भाजपा कार्यकर्ता बंगाल में नारी वंदन का पोस्टर बॉय है। बेशक ऐसी हरकतों से साफ नजर आता है कि भाजपा के लिए नारी वंदन भी चुनावी पैंतरे से ज्यादा और कुछ नहीं है। वैसे भी नारी को वंदना के लायक बताने का खेल सदियों से पितृसत्तात्मक समाज खेलता आया है। एक तरफ उन्हें भरम में रखो कि हम तो तुम्हें देवी बनाकर पूजते हैं और दूसरी तरफ उन्हें अपमानित, प्रताड़ित, शोषित करते रहो। मोदी सरकार भी जिस तरह से नारी वंदन अधिनियम लेकर आई, वह नाम के खिलवाड़ से ज्यादा कुछ नहीं है।
महिलाओं को सशक्त करने के लिए नाम की नहीं काम की और उससे पहले इरादे की जरूरत होती है, जिसका अभाव मोदी सरकार और भाजपा में साफ नजर आता है। नारी वंदन की जगह आज नारी विमर्श की जरूरत है, लेकिन वह भाजपा के दायरे में कहीं होता हुआ नहीं दिख रहा है। जो दिख रहा है, वह यही कि महिलाओं को रस्सी से बांधकर घसीटा और मारा जा रहा है। भले यह असल में नहीं हो रहा है, लेकिन जो नफरत है, वह तो बिल्कुल असली है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का दीदी ओ दीदी, ऐई दीदी कहना अगर शाब्दिक हिंसा के समान था, तो अब उनके कार्यकर्ता अपनी कुंठा को ममता बनर्जी का स्वांग धरे पुरुष पर या एक महिला को ममता बनर्जी के समान दिखाकर जिस तरह निकाल रहे हैं, वह न केवल बंगाल के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर चिंता की बात होनी चाहिए। क्योंकि जब यह कुंठा और परपीड़क सुख का विकार असल में निकलता है तो फिर मणिपुर जैसी घटनाएं घटती हैं।
यूं तो पूरे देश में स्त्रियां बेहद असुरक्षित हैं। 3-4 साल की बच्चियों से लेकर 80-90 साल की वृद्धाएं कोई भी सुरक्षित नहीं है। लेकिन 2023 में मणिपुर में कुकी जोमी समुदाय की दो महिलाओं के साथ भीड़ ने जो सुलूक किया था, उसे याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। नफरत से भरी भीड़ ने इन महिलाओं को नग्न करके जुलूस निकाला था, उनके साथ बलात्कार किया और इस घटना से पहले जब इन महिलाओं ने एक पुलिस जीप में बैठकर अनुरोध किया था कि उन्हें बचा लें, तो उन्हें कहा गया कि चाबी नहीं मिल रही है। ये बात सीबीआई रिपोर्ट में भी दर्ज है। यानी जाहिर है कि दो महिलाओं के साथ जो हिंसा नफरत से भरे पुरुषों के हुजूम ने की, उसमें पुलिस प्रशासन का भी पूरा सहयोग था। यह किसी सभ्य, विकसित या विश्वगुरु कहाए जाने वाले देश की पहचान तो कतई नहीं हो सकती, लेकिन तब इसी वीभत्स चेहरे को पूरी दुनिया ने देखा था और इस पर जमकर निंदा भी की गई।
बस मोदी सरकार को इस मामले को सुनने-समझने में देरी हुई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बहुत बाद में जाकर इस घटना पर निंदा के दो शब्द कहने की औपचारिकता निभाई। तो मोदी के, भाजपा के नारी वंदन का सच यही है। मध्ययुगीन भारत में औरतों, बच्चों, युद्धबंदियों और गुलामों पर ऐसे अमानवीय अत्याचार के प्रसंग भरे पड़े हैं। अब हम 21वीं सदी में हैं, लेकिन समाज के एक तबके की पूरी मानसिकता को उसी मध्ययुग के हिसाब से ढालकर, उन्हें मानसिक तौर पर विकृत करने का काम बीजेपी ने मुमकिन कर दिखाया है। केवल भाजपा के विजय जुलूसों में हिंसा नहीं हो रही, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों पर भी भाजपा की जीत कहर बनकर टूट रही है।
पूरे बंगाल में कई जगहों पर टीएमसी कार्यालयों को तोड़ा या जलाया गया है। इसके अलावा मंगलवार रात कोलकाता के न्यू मार्केट में एक मीट की दुकान को बुलडोजर से तोड़ा गया, कुछ लोगों के साथ मारपीट भी हुई है। और यह सब चुनाव आयोग के शांतिपूर्ण चुनाव करना के दावे के बीच हुआ है। जिसके लिए केन्द्रीय सुरक्षा बलों के लाखों जवान पूरे राज्य में तैनात किए गए। याद रखा जाए कि प्रधानमंत्री मोदी ने जीतते ही कहा कि अब बदला नहीं बदलाव की बात होगी, भय नहीं भविष्य की बात होगी। तो क्या इसी बदलाव और ऐसे ही भविष्य के लिए प.बंगाल में भाजपा सत्ता में आई है।
कुछ अति चालाक लोग मासूम तर्क दे रहे हैं कि 2011 में जब ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार का शासन बंगाल से खत्म किया था, तब टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने भी ऐसी ही हिंसा की थी। वामपंथी भी अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हिंसक तरीकों का सहारा लेते थे। लेकिन क्या ऐसे तर्कों से आज की हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है। अगर वामपंथियों और टीएमसी के लोगों ने गलत किया था तो क्या अब भाजपा के लोग उसी गलत को आगे बढ़ाने के लिए सत्ता में आए हैं। फिर ये परिवर्तन कैसे कहलाएगा। ये तो यथास्थिति को बरकरार रखना होगा। अगर भाजपा को टीएमसी से बेहतर सरकार बनाने और शासन चलाने का दावा करना है, तो फिर उसके लिए स्वस्थ मानसिकता से काम भी करना होगा। अभी तो नफरत की गंभीर बीमारी का शिकार बंगाल और पूरा देश दिखाई दे रहा है।
