भारतीय स्टेट बैंकः राष्ट्र निर्माण की बैंकिंग यात्रा

भारतीय स्टेट बैंकः राष्ट्र निर्माण की बैंकिंग यात्रा

अरुण डनायक

1 जुलाई भारतीय बैंकिंग इतिहास की एक महत्वपूर्ण तिथि है। इसी दिन वर्ष 1955 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की स्थापना की गई थी। आज यह केवल भारत का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक ही नहीं, बल्कि देश के आर्थिक, सामाजिक और ग्रामीण विकास का एक सशक्त आधार स्तंभ भी है।

एसबीआई की जड़ें ब्रिटिश काल तक जाती हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में स्थापित तीन प्रेसीडेंसी बैंक—बैंक ऑफ बंगाल (1809), बैंक ऑफ बॉम्बे (1840) और बैंक ऑफ मद्रास (1843)—का वर्ष 1921 में विलय कर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बनाया गया। उस समय यह देश का सबसे प्रभावशाली बैंक था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना से पूर्व इंपीरियल बैंक सरकार का बैंकर होने के साथ-साथ मुद्रा नोट जारी करने का अधिकार भी रखता था तथा बैंकों का बैंक और क्लियरिंग हाउस जैसी केंद्रीय बैंकिंग सेवाएं भी प्रदान करता था।

हालांकि, इंपीरियल बैंक की कुछ गंभीर सीमाएं थीं। उसके प्रबंधन और पूंजी पर विदेशी हितों का प्रभाव था, ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पहुंच अत्यंत सीमित थी तथा भारतीय व्यापारियों और किसानों की आवश्यकताओं के प्रति उसका दृष्टिकोण पर्याप्त संवेदनशील नहीं माना जाता था। विशेष रूप से ग्रामीण ऋण व्यवस्था के विकास में उसकी भूमिका संतोषजनक नहीं थी।

1951 में गठित अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति ने अपनी रिपोर्ट में बैंकिंग सुविधाओं को गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। समिति की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार ने इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप 1 जुलाई 1955 को भारतीय स्टेट बैंक अस्तित्व में आया।

एसबीआई की स्थापना केवल एक बैंक के निर्माण की घटना नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की विकास दृष्टि का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। इसके सामने अनेक राष्ट्रीय दायित्व रखे गए। इसका उद्देश्य ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करना, कृषि और सहकारी क्षेत्र को वित्तीय सहायता देना, लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करना, बचत की आदत विकसित करना तथा देश में सस्ती और विश्वसनीय प्रेषण सेवाएं उपलब्ध कराना था।

स्थापना के समय एसबीआई को पांच वर्षों में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 400 नई शाखाएं खोलने का लक्ष्य दिया गया था, जिसे उसने निर्धारित समय से पहले ही पूरा कर लिया। इसके बाद भी ग्रामीण विस्तार बैंक की प्रमुख प्राथमिकता बना रहा। किसानों को प्रत्यक्ष कृषि ऋण, सहकारी बैंकों को रियायती वित्तीय सहायता, कृषि विपणन समितियों को सहयोग, भूमि विकास बैंकों में निवेश तथा कृषि उपज के विरुद्ध ऋण जैसी पहलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई शक्ति प्रदान की।

1968 में बैंक ने कृषि क्षेत्र के लिए व्यापक नीतियां लागू कीं और बाद में “क्षेत्रीय दृष्टिकोण”, “ग्राम गोद लेने की योजना” तथा “कृषि विकास शाखाओं” जैसी नवाचारी पहलों के माध्यम से ग्रामीण बैंकिंग को नई दिशा दी। इन विशेष शाखाओं के तकनीकी विशेषज्ञ सीधे गांवों तक पहुंचकर किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप सहायता उपलब्ध कराते थे।

लघु और कुटीर उद्योगों के विकास में भी एसबीआई ने अग्रणी भूमिका निभाई। 1956 से विशेष सहायता योजनाओं के माध्यम से उद्यमियों को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया गया। बाद में “क्रेडिट गारंटी योजना” तथा “किस्त योजना” जैसी पहलों ने छोटे उद्योगों के लिए वित्तीय संसाधनों तक पहुंच को सरल बनाया। समाज के कमजोर वर्गों, शिल्पकारों, छोटे दुकानदारों तथा स्वरोजगार से जुड़े लोगों को रियायती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराना भी बैंक की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल रहा।

विदेशी मुद्रा कारोबार और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग में भी एसबीआई ने उल्लेखनीय प्रगति की। वैश्विक वित्तीय केंद्रों में अपनी उपस्थिति के माध्यम से उसने भारतीय बैंकिंग की अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूत किया तथा अनिवासी भारतीयों, निर्यातकों, आयातकों और विदेश जाने वाले भारतीयों को विविध बैंकिंग सेवाएं प्रदान कीं।

समय के साथ एसबीआई ने स्वयं को बदलती तकनीक के अनुरूप ढाला। कंप्यूटरीकरण से लेकर डिजिटल बैंकिंग युग तक बैंक ने निरंतर नवाचार अपनाए। इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, योनो प्लेटफॉर्म, म्यूचुअल फंड, सामान्य बीमा, क्रेडिट कार्ड तथा अन्य डिजिटल भुगतान सेवाओं के माध्यम से एसबीआई आज करोड़ों ग्राहकों को आधुनिक बैंकिंग सुविधाएं प्रदान कर रहा है।

अपनी सात दशक की विकास यात्रा में एसबीआई को नागरवाला प्रकरण, प्रतिभूति घोटाले, आपातकालीन दौर के दबाव, श्रमिक असंतोष तथा बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। किंतु प्रशासनिक सुधारों, तकनीकी आधुनिकीकरण, बेहतर जोखिम प्रबंधन और ग्राहक-केंद्रित सेवाओं के माध्यम से बैंक ने स्वयं को लगातार सुदृढ़ किया और अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखी।

एसबीआई के इतिहास में कई निष्ठावान और समर्पित चेयरमैन हुए, पर आर. के. तलवार का नाम सर्वाधिक सम्मानित चेयरमैनों में लिया जाता है। उन्होंने ईमानदारी, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को सुदृढ़ किया तथा अपने नेतृत्व, आदर्श आचरण और दूरदृष्टि से बैंककर्मियों की पीढ़ियों को प्रेरित किया।

ग्रामीण भारत की सेवा के उद्देश्य से स्थापित एसबीआई आज विश्व के अग्रणी बैंकों में गिना जाता है। 31 मार्च 2026 तक इसके कुल जमा 59.76 लाख करोड़ रुपये, ऋण एवं अग्रिम 49.33 लाख करोड़ रुपये तथा शुद्ध लाभ 80,032 करोड़ रुपये रहा। देश की बैंकिंग प्रणाली में जमा और ऋण वितरण में इसकी हिस्सेदारी क्रमशः 22.46 प्रतिशत और 20.19 प्रतिशत है, जबकि सकल एनपीए मात्र 1.49 प्रतिशत है।

एसबीआई के लगभग 52.93 करोड़ ग्राहक, 22,500 से अधिक शाखाएं, 63,000 से अधिक एटीएम तथा 36 देशों में 241 विदेशी कार्यालय हैं। मार्च 2026 तक बैंक में 2.45 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत थे।

वर्ष 2025-26 में एसबीआई ने वित्तीय उपलब्धियों के साथ अनेक प्रतिष्ठित सम्मान भी अर्जित किए। ग्लोबल फाइनेंस ने उसे “बेस्ट बैंक इन इंडिया 2025” तथा “बेस्ट ट्रेड फाइनेंस बैंक इन इंडिया 2026” चुना, जबकि इकनॉमिक टाइम्स ह्यूमन कैपिटल अवॉर्ड्स 2026 में उसे चार स्वर्ण पुरस्कार प्राप्त हुए।

अपने कर्मचारियों की विविध प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए बैंक ने वर्ष 2025 में “एसबीआई स्टार अवार्ड” की स्थापना की। इसके अंतर्गत कला, साहित्य, खेलकूद तथा सामाजिक योगदान के क्षेत्र में उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल करने वाले कर्मचारियों को सम्मानित किया जाता है। यह पहल दर्शाती है कि एसबीआई अपने कर्मचारियों को केवल बैंककर्मी नहीं, बल्कि समाज के सृजनशील और उत्तरदायी नागरिक के रूप में भी देखता है।

भारतीय स्टेट बैंक का स्थापना दिवस केवल एक वित्तीय संस्था का उत्सव नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा का उत्सव भी है। प्रेसीडेंसी बैंकों और इंपीरियल बैंक से लेकर आधुनिक डिजिटल एसबीआई तक की यह कहानी बताती है कि बैंक केवल वित्तीय लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सशक्त उपकरण भी हो सकता है।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक हैं।)

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