दोहरा तेल संकट और कमजोर भारतीय रुपया

डॉ.अजीत रानाडे….
भरतीय रिजर्व बैंक के मार्च 2026 के द्विमासिक पारिवारिक मुद्रास्फीति अनुमान सर्वेक्षण के अनुसार अनुमानित मुद्रास्फीति 7.2 प्रतिशत है। यह फरवरी के आधिकारिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित 3.2 प्रतिशत के आंकड़े से दोगुने से भी अधिक है। सीपीआई को हाल ही में वास्तविक मुद्रास्फीति के अधिक सटीक आकलन करने के लिए संशोधित किया गया था। आरबीआई सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि अगले तीन महीनों में कीमतों में 8.5 प्रतिशत और पूरे वर्ष में 8.8 फीसदी वृद्धि का अनुमान है।

यह कोई सांख्यिकीय विसंगति या लोकप्रिय निराशावाद नहीं है। यह जमीनी हकीकत है तथा राजनीतिक रूप से आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर शायद ही कभी इतना संवेदनशील रहा हो। इस बीच भारत दोहरे तेल संकट से जूझ रहा है। पहला संकट ईंधन का है। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण मार्च में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई जिससे परिवहन और बिजली की लागत बढ़ गई है। लगभग सभी विनिर्मित वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ रही हैं।

आरबीआई खुद मानता है कि अगर संघर्ष फिर से शुरू होता है तो साल के लिए उसका 85 डॉलर प्रति बैरल का आधारभूत अनुमान आसानी से टूट सकता है। इस महीने की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच घोषित युद्धविराम अस्थायी स्वरूप का है। शांति वार्ता विफल हो चुकी है। संघर्ष फिर से शुरू होने से तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा और इसके कारण भारत में महंगाई भी तेजी से बढ़ेगी। दूसरा तेल वह है जिसका उपयोग भारतीय नागरिक खाना पकाने में करते हैं। भारत अपने खाद्य तेलों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है।

पाम तेल इंडोनेशिया और मलेशिया से, सोया तेल अर्जेंटीना व ब्राजील से तथा सूरजमुखी तेल रूस एवं यूक्रेन से मंगाया जाता है। पश्चिम एशियाई संकट ने वैश्विक कमोडिटी बाजारों को हिलाकर रख दिया है और कच्चे तेल के साथ-साथ वनस्पति तेलों की कीमतों में भी उछाल आया है। खुदरा खाद्य तेल की कीमतें मात्र एक सप्ताह में 1 से 4 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ गईं। कीमतों को लेकर चिंतित रिफाइनरों द्वारा आयात रोके जाने के कारण मार्च में भारत का पाम तेल आयात 19 प्रतिशत गिरकर तीन महीने के निचले स्तर पर आ गया। इससे आने वाले महीनों में घरेलू उपलब्धता और भी कम हो जाएगी। ये दोनों तेल घरेलू बजट पर भारी पड़ते हैं।

ब्रेकप्वाइंट नामक एक नई पुस्तक में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवा, दवा, शिक्षा, परिवहन और मकान किराए में मुद्रास्फीति का वास्तविक अनुभव कई वर्षों से उच्च रहा है। भारत की हाल ही में संशोधित सीपीआई बास्केट में अभी भी एक संरचनात्मक खामी है। यह उन मौजूदा किरायेदारों द्वारा भुगतान किए जाने वाले किराए को शामिल करता है जिनके पट्टे सालाना 5-10 प्रतिशत की दर से बढ़ते हैं जबकि नए किराएदारों से लिए जाने वाले बाजार किराए को अनदेखा करता है।

भारत के शहरों में दलाल और किरायेदार नियमित रूप से किराए में दो अंकों की वृद्धि की रिपोर्ट कर रहे हैं जबकि आधिकारिक आवास मुद्रास्फीति दर कम बनी हुई है। सूचकांक गलत कीमत माप रहा है। आधिकारिक पद्धति सही स्थिति नहीं बता रही है। यह सब वास्तविक मजदूरी में ठहराव की पृष्ठभूमि में हो रहा है, खासकर ग्रामीण भारत में यह हो रहा है। जब हर चीज महंगी हो जाती है और मजदूरी उस अनुपात में नहीं बढ़ती तो परिवार पोषण में कटौती करते हैं, चिकित्सा देखभाल में देरी करते हैं और बच्चों को निजी स्कूलों से निकाल लेते हैं। हरियाणा के मानेसर और नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरी वृद्धि के लिए हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शन केवल श्रम विवाद नहीं हैं।

ये मुद्रास्फीति का सामाजिक प्रकटीकरण हैं। मानेसर में कारखाने के श्रमिकों ने काम का बहिष्कार किया, पुलिस से झड़प की और सरकार को एक नाटकीय रियायत देने के लिए मजबूर किया। सरकार ने अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी में 35 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की। यह बमुश्किल पर्याप्त है। मुद्रास्फीति की तुलना में मजदूरी में वृद्धि न होने के खिलाफ वर्षों से चली आ रही घुटन का प्रदर्शन था। नोएडा में गारमेंट और होजरी फैक्ट्रियों के मजदूरों ने पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़-फोड़ शुरू कर दी। वे भी न्यूनतम मजदूरी में हरियाणा की तरह ही बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं।

भारत में लगभग 40 करोड़ आंतरिक प्रवासी मजदूर हैं जो खाने और ईंधन की कीमतों के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं। जब एक वक्त के खाने की कीमत दोगुनी हो जाती है और गैस सिलेंडर मिलना मुश्किल हो जाता है तो उनमें से कई लोग सीधे अपने गांवों को लौट जाते हैं। भारतीय लघु और मध्यम उद्यम मंचश् (स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेस फोरम- एसएमई) अक्सर यह बात दोहराता है कि श्एक बार मजदूर चले जाएं तो उन्हें वापस लाना बहुत मुश्किल होता है। भारत की मैन्युफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धा पर पहले से ही वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावटों का दबाव है और अब उस पर एक असली खतरा मंडरा रहा है।

मैक्रो स्तर पर देखें तो पिछले वित्त वर्ष में डॉलर के मुकाबले रुपया 10 प्रतिशत गिरा है। मार्च में यह गिरावट बहुत तेजी से हुई और विनिमय दर 95 के पार चली गई। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस पर कड़ी कार्रवाई करते हुए जवाब दिया। रिजर्व बैंक ने रुपये-डॉलर की दर पर होने वाली ऑफ-शोर सट्टेबाजी में घरेलू बैंकों की भागीदारी पर लगभग पूरी तरह से रोक लगा दी है। इसे श्नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्डश् (एनडीएफ) मार्केट कहा जाता है। यह तकनीकी रूप से रिजर्व बैंक के नियामक दायरे से बाहर है और सिंगापुर, लंदन या न्यूयॉर्क से संचालित होता है। यह रोजाना 149 अरब डॉलर का एक ऑफ-शोर मार्केट है जो गिरते हुए रुपये के जोखिम से बचाव (हेजिंग) का अवसर प्रदान करता है। साथ ही यह देश के भीतर (ऑन-शोर) मौजूद लोगों के लिए एक संकेत का भी काम करता है जिससे वे यह अंदाजा लगा पाते हैं कि रुपये की चाल किस दिशा में होगी।

हालांकि रिजर्व बैंक की अचानक की गई इस सख्त कार्रवाई से रुपये में उछाल आया है लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर ईरान में युद्ध जारी रहता है तो यह स्थिति कब तक बनी रहेगी। ऐसे में रुपये को सहारा देने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा किए गए हस्तक्षेप के कारण अकेले मार्च महीने में ही भारत को अपने कीमती विदेशी मुद्रा भंडार में से 30.5 अरब डॉलर गंवाने पड़े हैं। आरबीआई ने बैंकों द्वारा रुपये की कमजोरी से मुनाफा कमाने के लिए ऑफशोर-ऑनशोर गैप का इस्तेमाल करने पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। लेकिन ध्यान से देखने वाला कोई भी व्यक्ति समझेगा कि ऑफशोर एनडीएफ बाजार तो सिर्फ एक लक्षण है, बीमारी नहीं। असली बीमारी तो भारत का ढांचागत चालू खाता घाटा है जो तेल आयात के भारी बिलों की वजह से और बढ़ गया है। इसके साथ ही पिछले दो वर्षों में पोर्टफोलियो से 26 अरब डॉलर का आउटफ्लो हुआ है और शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई- फॉरेन डॉयरेक्ट इन्वेस्टमेंट) भी शून्य या नकारात्मक हो गया है।

ये अर्थव्यवस्था की ऐसी कमजोरियां हैं जिन्हें डेरिवेटिव-बाजार की कितनी निगरानी करके भी हमेशा के लिए ठीक नहीं किया जा सकता। इस हफ्ते आईएमएफ और विश्व बैंक की बैठकें होने वाली हैं तो वैश्विक विकास के अनुमानों को नीचे की ओर संशोधित किया जा रहा है। आरबीआई ने रेपो दर को 5.25 प्रति सैकड़ा पर ही बनाए रखा है और अनुमान लगाया है कि 2026-27 में मुद्रास्फीति औसतन 4.6 प्रतिशत रहेगी। ये बहुत ही सोच-समझकर लगाए गए अनुमान हैं लेकिन अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, अगर पश्चिम एशिया में संघर्ष-विराम टूट जाता है और अगर मानसून उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता तो इन अनुमानों का बचाव करना मुश्किल हो जाएगा- और इनमें से किसी भी बात को असंभव मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भारतीय परिवार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की प्रेस रिलीज नहीं पढ़ता। वह कुकिंग ऑयल के टिन पर लिखी कीमत, गैस सिलेंडर का बिल, स्कूल फीस का नोटिस, मेडिकल इनवॉइस पढ़ता है और यह रिजर्व बैंक सर्वे को बता रहा है कि कीमतें ऑफिशियल रेट से दोगुने से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। यही आवाज मायने रखती है- और यह साफ और जरूरी तौर पर कह रही है कि जख्म की जलन अभी खत्म नहीं हुई है।

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