महिला आरक्षण विधेयक : नाम भर में है ‘वंदन’

मीनाक्षी नटराजन…

नारी वंदन अधिनियम विधेयकश् वर्ष 2023 में सर्व-सम्मति से पारित हुआ था। प्रमुख विपक्षी दलों ने 2024 के आम चुनाव से ही महिला आरक्षण को लागू करने की पेशकश की थी। सरकार ने इसे यह कहकर टाल दिया था कि जनगणना और परिसीमन के पहले यह सम्भव नहीं है। तब तक जाति जनगणना को देशद्रोही कदम के बतौर प्रस्तुत किया जा रहा था। इस बीच नवीन लोकसभा का सदन करीबन आठ सौ सदस्यों के लिए बनाया गया। वो सरकार जो जातिगत गिनती के लिए कुछ समय पहले ही घुटने टेक चुकी थी, जो पहले कहती थी कि जनगणना इतनी जल्दी नहीं हो सकती, इसलिए श्महिला आरक्षणश् भी नहीं हो सकता, उसे अब सब कुछ जल्द क्रियान्वित करने की गरज क्यों?

कुछ और भी बुनियादी सवाल हैं। विपक्ष ने वृहद नारी समता और न्याय के चलते विधेयक के नामकरण पर अटकना रणनीतिक तौर पर आवश्यक नहीं समझा होगा। नाम में क्या रखा है, असल मकसद को समझा जाये। ऐसी विचार व्यवस्था बहुत हद तक पैठ चुकी है, पर नाम राजनीतिक होते हैं। खासकर विधेयकों के नाम को राजनीति से परे नहीं मान सकते। महिला अपनी विभिन्न भूमिकाओं से परे मानव हैं। यह निसर्ग द्वारा प्रदत्त हक है। इसको मान्य किये बगैर किसी वंदन के कोई मायने नहीं। पितृसत्ता बरसों से स्त्री को परिभाषित करती आई है। वह कभी देवी, कभी दासी, कभी सहचरी के रूप में देखी जाती है। वह वन्दनीय, प्रातरू स्मरणीय होती है। मगर उसके कुछ मानक हैं जो पुरुष तय करते हैं। अहिल्या, सीता, तारा, मंदोदरी, द्रौपदी ब्राह्मणवादी आस्था परम्परा में प्रातरू स्मरणीय हैं। कीमत चुकाकर क्या कोई स्त्री वंदन योग्य हुई है? यह इन उदाहरणों से स्वयंसिद्ध है।एक तरह से इन पांचों पर थोपी गईं जबरदस्ती, तथाकथित शुद्धता की परीक्षा, उसके स्वामित्व का सवाल, उपभोग, उपयोग और वस्तुकरण को वैधानिकता मिलती है। वंदन की परंपरा में महिला हकघ् के साथ पैदा नहीं होती। उसको भलमनसाहत वाले पुरुष कुछ देते हैं।

जाहिर है, हकघ् के साथ पैदा होना और किसी से मेहरबानी में कुछ प्राप्त करना दो बहुत अलग व्यवस्था है। प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने स्त्री को हमारी तहजीब के मेरुदंड की तरह देखा था। उन्होंने महिलाओं को आरक्षण देने की पेशकश की, लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने से चौसठवां संविधान संशोधन पारित नहीं हो सका। बाद में 1993 में वह पारित हुआ। पितृसत्ता के गढ़ में एक तिहाई आरक्षण सुनिश्चित हुआ। वही बाद में अनेक राज्यों में पचास फीसदी में तब्दील हुआ। गांव और मोहल्लों में पितृसत्ता फलीभूत होती है, तब भी यह हो सका।

यह करते समय पुरुषों की प्रधानता को ललकारा गया। आज सीट बढ़ाकर महिला आरक्षण करने की गरज दरअसल पुरुष प्रधानता को सुनिश्चित रखने की कवायद है, ताकि वह यथावत रहे। वरना महिला आरक्षण का परिसीमन से क्या वास्ता? मौजूदा 543 सदस्यों में एक तिहाई आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता? इसमें अनुसूचित जाति – जनजाति की महिला के लिए तो स्थान सुनिश्चित होगा, मगर अनेक राज्यों ने पिछड़ा वर्ग का आरक्षण स्थानीय निकाय में निर्धारित किया है। पिछड़े वर्ग का आरक्षण भले ही विधानसभा, लोकसभा में न हो, परन्तु पिछड़ा वर्ग महिला आरक्षण जरूर होना चाहिए। आखिर कामगार समुदाय की महिलाओं के हाथ पूरी ग्रामीण व्यवस्था है। वह किसान है, खेत मजदूर है, कुम्हार है, पशुपालक है।

तमाम निर्माण उसके हाथों होता है। मिस्त्री, बढ़ई, लुहारी कोई काम उससे नहीं छूटा। ये सारे पेशे जातिगत व्यवस्था में जातियों से भी जुड़े हैं। जैसे बाबा साहेब आम्बेडकर कहते थे कि काम नहीं, कामगार का बंटवारा होता है। वही संस्थागत जातिप्रथा है। यह आरक्षण सुनिश्चित किये बिना जो वंदन होगा वो केवल जातिगत प्रधानता को पुष्ट करने का माध्यम होगा। हुक्मरान इस वंदन को श्लाडली बहनाश् की तरह मेहरबानी में बदलना चाहते हैं। श्लाडली बहनाश् को कुछ आर्थिक सहायता मिलती है, मगर उससे स्वावलम्बन और स्वाभिमान छिनता है। वो एक तरफ पितृसत्ता की वाहक बनाई जाती है, दूसरी तरफ मर्जी से विवाह नहीं कर सकती। उसके बचत के पैसे नोटबन्दी में उससे छीने गए। वो खिलाड़ी होते हुए यौन-शोषण के खिलाफ आवाज उठाती है तो आरोपी को माला पहनाकर स्थापित किया जाता है। उसे आस्था केंद्रों पर प्रवेश की अनुमति नहीं। वो संस्कृति के नाम पर वैवाहिक बलात्कार झेलती रहती है। पितृसत्ता ने ट्रांसजेंडर को तो न्यूनतम मानवीय हकघ् से भी वंचित किया है, अपनी लैंगिक पहचान चुनने का हक है।

ऐसे में कैसा वंदन! वंदन केवल आज्ञाकारी का होगा। यदि असल में मौका देने की बात होती तो वो अभी से हो सकती थी। बिना स्थापित पुरुषों के भावी क्रंदन का संज्ञान लिए होती तो उसको क्रांतिकारी राजनीति कह सकते थे। यह बंदरबांट है। परिसीमन के नाम पर छोटे राज्यों की आवाज को जमींदोज नहीं किया जाना चाहिए। न ही भारत की संघीय व्यवस्था को चोट पहुंचनी चाहिए। वे राज्य बंधुता के चलते गरीबी से जूझते राज्यों को अपने हिस्से का प्रतिभाग देते आये हैं, देना भी चाहिए। आखिर संघीय व्यवस्था में हर राज्य की खास भूमिका है।

बंधुता की नींव को हिलाना उचित नहीं। यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी कम हो गया तो क्या न्याय रह जायेगा? श्महिला आरक्षण्य को इस व्यापक मुद्दे का कवच न बनाया जाए। नारी अनुकम्पा नहीं, समता चाहती है। उसको वन्दनीय होने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वो समझती है कि वंदना की आड़ में पुरुष प्रधानता को शुद्धता, चरित्र को प्रामाणित करने, कीचड़ उछालने, आग में जलाने, उसकी मर्जी पर पहरा बिठाने का लाइसेंस मिलता है। उसको वंदना नहीं, न्याय चाहिए। वो हकघ् के साथ पैदा हुई। वह हकघ् उसका जन्मसिद्ध है। वह उसे चाहिए। श्परिसीमनश् के नाम पर पुरुष के लिए स्थान आरक्षित करने की बजाय उसी धरातल पर अपने लिए जगह चाहिए।

जिनको लगता है कि सीट बढ़ेगी तो वो सिमट कर रह जायेगी, उन्हें याद रहे कि संविधान पुरुष को आरक्षित नहीं करता। सामान्य कहलाती सीट अनारक्षित हैं जहां महिला भी खड़ी हो सकती है। तो क्या सरकार ने जैसे सामाजिक न्याय पर आर्थिक आरक्षण थोपकर जातिगत प्रधानता को पुनरू अवसर दिया है, वैसा ही लैंगिक प्रधानता के लिए भी करना चाहती है?

(लेखिका सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय मीनाक्षी नटराजन मंदसौर से संसद सदस्य रही हैं। वे बायोकैमिस्ट्री में स्नातकोत्तर और कानून में स्नातक है।)

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