नई दिल्ली, 28 जुलाई 2026 (यूएनएस)। देशभर में पेपर लीक विवाद और छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में लोकसभा में मंगलवार को पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) (संशोधन) विधेयक, 2026 पर जोरदार बहस हुई। सरकार ने इसे परीक्षा माफिया के खिलाफ अब तक का सबसे सख्त कानूनी कदम बताया, जबकि विपक्ष ने कहा कि केवल सजा बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा और परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही भी तय करनी होगी।
विधेयक पेश करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य से किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने बताया कि यह संशोधन 2024 के कानून को और प्रभावी बनाने के लिए लाया गया है, ताकि पेपर लीक, संगठित नकल और परीक्षा से जुड़ी आपराधिक गतिविधियों पर निर्णायक रोक लगाई जा सके।
5 महीने में जांच से फैसला तक का लक्ष्य
जितेंद्र सिंह ने कहा कि संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था है। इसके तहत पेपर लीक से जुड़े मामलों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी, जबकि अदालत को तीन महीने के भीतर फैसला सुनाना होगा। यानी अपराध होने से लेकर निर्णय आने तक पूरी प्रक्रिया अधिकतम पांच महीने में पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही अपील के लिए भी 30 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है।
दंड भी हुआ कई गुना सख्त
संशोधन विधेयक में सजा और जुर्माने दोनों को काफी बढ़ाया गया है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार—
पेपर लीक या अनुचित साधनों का उपयोग करने पर 5 से 10 वर्ष तक की जेल और ₹50 लाख तक जुर्माना।
परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी की संलिप्तता या लापरवाही पर ₹5 करोड़ तक जुर्माना।
संगठित परीक्षा माफिया या गिरोह से जुड़े मामलों में कम से कम 7 वर्ष की सजा और ₹10 करोड़ तक जुर्माना।
दोषी सेवा प्रदाताओं को 8 वर्ष तक परीक्षा आयोजन से प्रतिबंधित किया जा सकेगा।
सरकार ने गिनाए पुराने पेपर लीक के मामले
बहस के दौरान जितेंद्र सिंह ने कहा कि पेपर लीक की घटनाएं किसी एक राज्य या सरकार तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने रेलवे भर्ती परीक्षा, एम्स प्रवेश परीक्षा समेत पूर्व वर्षों के कई मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले ऐसी घटनाओं पर प्रभावी कानूनी ढांचा नहीं था। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान सरकार ने पहले राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) बनाई और फिर 2024 में पहला व्यापक कानून लागू किया, जिसे अब और मजबूत किया जा रहा है।
विपक्ष ने कहा- केवल कानून नहीं, जवाबदेही भी जरूरी
विपक्षी दलों ने विधेयक का विरोध नहीं किया, लेकिन सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने कहा कि यदि परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होगी तो केवल सजा बढ़ाने से छात्रों का भरोसा वापस नहीं आएगा। विपक्ष ने एनटीए की कार्यप्रणाली, हालिया परीक्षा विवादों और छात्रों के साथ हुए घटनाक्रम का मुद्दा भी उठाया।
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का जिक्र करते हुए सरकार पर निशाना साधा, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि सरकार हर प्रशासनिक विफलता के बाद नया कानून या नई समिति बना देती है, लेकिन व्यवस्था में सुधार नहीं कर पाती। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने भी परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की मांग की।
एनईईटी विवाद के बाद आया संशोधन
सरकार के अनुसार, मई 2026 में नीट-यूजी परीक्षा रद्द होने और दोबारा आयोजित किए जाने के बाद परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में संशोधन विधेयक तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य समयबद्ध जांच, त्वरित न्याय और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करना है।
लोकसभा में विधेयक पर विस्तृत चर्चा जारी रही और सरकार ने भरोसा जताया कि संशोधित कानून लागू होने के बाद संगठित पेपर लीक नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगेगा तथा देशभर के करोड़ों छात्रों का परीक्षा प्रणाली पर विश्वास और मजबूत होगा।