भारत की युवाशक्ति का सबसे पवित्र तीर्थ

संदीप सिंह

जनपथ मेट्रो से टॉलस्टॉय मार्ग तक, पूरी जंतर-मंतर रोड, फिर कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल में रीगल सिनेमा और पिंड बलूची प्वाइंट से संसद मार्ग तक सड़क खचाखच भरी है। आसपास के दो किलोमीटर के दायरे में युवा चींटियों की तरह बिखरे हुए हैं। पूरे इलाके में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है। कनॉट प्लेस में भी नेटवर्क ठप है।

जंतर-मंतर पर इस समय कुछ ऐसा घट रहा है, जो किसी भी देश के इतिहास में कभी-कभार ही देखने को मिलता है। एक पूरी पीढ़ी की राजनीतिक और नैतिक दीक्षा हो रही है। एक ऐसी नई फौज तैयार हो रही है, जिसकी सामूहिक शक्ति के सामने बड़े-बड़े दलों की तथाकथित चुनावी मशीनें ताश के पत्तों की तरह बिखर सकती हैं।

जो काम पिछले दस वर्षों में नहीं हो पाया, वह पिछले एक सप्ताह में हो गया। भारत के युवाओं ने अपनी आवाज़ बुलंद कर दी है। उन्होंने अपना संदेश स्पष्ट कर दिया है—उन्हें यह व्यवस्था स्वीकार नहीं, वे बदलाव चाहते हैं।

अब आगे क्या होगा, यह समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि यह आंदोलन अब केवल नीट और पेपर लीक का विरोध नहीं रह गया है। वह मुद्दा अपनी जगह है, पर बात उससे कहीं आगे निकल चुकी है।

अब यह आंदोलन युवा गुस्से, युवा बेबसी, बेरोजगारी, हताशा, साहस, अल्हड़पन, सामूहिकता और उत्साह का एक शांत लेकिन प्रचंड दावानल बन चुका है। यह अब भारत की युवाशक्ति का उत्सव है। जंतर-मंतर आज भारत की युवाशक्ति का सबसे पवित्र तीर्थ बन गया है। इस समय शायद यह संसार की सबसे सुंदर जगह है।

कल्पना कीजिए कि जैसे किसी ज्वालामुखी का मुंह खुल गया हो और उसका लावा सड़कों पर फैलता जा रहा हो। इस लावे की गर्मी लोकतंत्र पर जमी बर्फ को पिघला रही है। लेकिन यह विध्वंस का नहीं, निर्माण का ज्वालामुखी है। यह शरीर को नहीं जला रहा, बल्कि मन को ऊर्जा और विश्वास दे रहा है।

20 जुलाई को यहां उमड़ी भीड़ लाख के आंकड़े को छूती दिखाई दे रही थी। दमन के बावजूद हजारों युवा मैदान छोड़ने को तैयार नहीं थे। इस भीड़ का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जीवन में पहली बार किसी आंदोलन या जंतर-मंतर पर आया था। फिर भी उनमें भय का नामोनिशान नहीं था। पुलिस की कार्रवाई के बाद भी वे सागर की लहरों की तरह बार-बार लौटकर प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे।

आंदोलन फीका पड़ने के बजाय और तेज होता जा रहा है। हजारों नए छात्र अपना बस्ता उठाकर देश के कोने-कोने से पहुंच रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि रात तक यह जनसैलाब लाख का आंकड़ा पार कर जाएगा।

चिंता भी होती है कि आगे इसका स्वरूप क्या होगा। यह आंदोलन अब न किसी कोर टीम के नियंत्रण में है, न किसी राजनीतिक दल के। शायद अब यह किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण में भी नहीं रहा। हालांकि मेरी राय में सोनम की नैतिक अपील अब भी युवाओं के बीच सबसे अधिक है।

जिन लोगों ने सोचा था कि 20 जुलाई के बाद यह आंदोलन सिमट जाएगा, शायद वे भी अब समझ चुके हैं कि मामला हाथ से निकल चुका है।

मिर्जापुर, इटावा, जयपुर, इंदौर, बेंगलुरु, प्रतापगढ़, गोरखपुर, सीतामढ़ी, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, दरभंगा, पटना, आरा, अजमेर, बीकानेर, गढ़वाल और न जाने कितने शहरों और गांवों से छात्र लगातार पहुंच रहे हैं।

अब यह जंगल की आग है। इसे बुझाना आसान नहीं होगा। यह व्यवस्था की सड़ांध को जलाकर राख कर सकती है। अब या तो यह व्यवस्था को बदलने की दिशा में जाएगा या फिर अपने ही संघर्ष में थम जाएगा।

दिल्ली पुलिस और आरएएफ के जवान लगातार बैरिकेड लगा रहे हैं, लेकिन भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है। मुख्य क्षेत्र में सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। छात्र कुछ देर भीतर रहते हैं, फिर बाहर आकर सांस लेते हैं और दोबारा अंदर चले जाते हैं।

जो लोग लौट रहे हैं, उनसे कई गुना अधिक नए छात्र पहुंच रहे हैं। सरकार ने रास्तों पर सुरक्षा और बैरिकेडिंग बढ़ा दी है। आसपास के 16 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं। आरएएफ और सीआरपीएफ की अतिरिक्त कंपनियां भी तैनात कर दी गई हैं। पूरा इलाका मानो सील होता जा रहा है।

फिर भी, मैंने अपने जीवन में इतनी अनुशासित, संयमित और सकारात्मक युवा शक्ति कभी नहीं देखी। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को यहां आकर इन युवाओं से सीखना चाहिए।

यदि कोई युवा आवेश में आ जाता है, तो बाकी लोग तुरंत उसे शांत कर देते हैं। इस आंदोलन की सबसे साहसी शक्ति लड़कियां हैं। वे कम बोलती हैं, लेकिन हर जिम्मेदारी चुपचाप निभा रही हैं। उनका संयम और साहस पूरे वातावरण को संतुलित बनाए हुए है।

जब पुलिस आक्रामक होती है, तब भी युवा हिंसक प्रतिक्रिया नहीं देते। वे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं, पुलिसकर्मियों को फूल देते हैं, राष्ट्रगान गाने लगते हैं। यदि कोई असामाजिक तत्व दिखाई देता है, तो उसे स्वयं पकड़कर बाहर कर देते हैं।

मंच से होने वाले भाषण केवल सामने बैठे कुछ हजार लोगों तक पहुंचते हैं। बाकी भीड़ स्वयं प्रेरणा से व्यवस्था संभाल रही है। यह अब केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि युवाओं की रचनात्मकता का विस्फोट बन चुका है।

दीवारों पर बनी ग्रैफिटी, पोस्टर, व्यंग्य, नारे और वन-लाइनर इस समय देश में सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्तियों में शामिल हैं।

20 जुलाई के बाद एक और महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। समाज ने इस आंदोलन को अपनी हथेली पर उठा लिया। उस दिन हुई पुलिस कार्रवाई ने शायद पूरे समाज को झकझोर दिया। हजारों छात्र बारिश में भीगते रहे, कई अस्पतालों में भर्ती हुए, सैकड़ों घायल हुए। इसके बाद लोगों ने घरों से निकलकर छात्रों की मदद शुरू कर दी।

देशभर से खाने-पीने का सामान आने लगा। कोई सौ बिरयानी भेज रहा था, तो कोई अपनी क्षमता के अनुसार सिर्फ एक पराठा। लेकिन भावना सबकी एक थी—इन युवाओं के साथ खड़े होने की।

गर्मी, उमस और बदबू के बीच भी छात्र डटे हुए हैं। इसी भीड़ में युवा हाथों में कूड़े की बड़ी थैलियां लेकर सफाई कर रहे हैं। महिलाएं झाड़ू और वाइपर लेकर पहुंच रही हैं। कई लोग पानी, केले, बिस्कुट और अन्य खाद्य सामग्री बांट रहे हैं।

एक आइसक्रीम वाला अपनी पूरी पेटी छात्रों के लिए खोल देता है। पूछने पर कहता है—”हमारे भी बच्चे हैं।”

यह दृश्य केवल आंदोलन का नहीं, समाज और युवाशक्ति के बीच बने एक नए रिश्ते का है।

कई बार मैं युवाओं के बीच खड़ा होकर उनकी बातें सुनता हूं। उनके विचारों की स्पष्टता देखकर आंखें नम हो जाती हैं। लगता है कि यह पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों को समझती है और उनसे लड़ने का साहस भी रखती है।

मुझे इस बात का भ्रम नहीं है कि अब कोई भी संगठन या नेतृत्व चाहकर भी इस भीड़ को अपनी सुविधानुसार मोड़ पाएगा। यदि कोई दिशा भटकाने की कोशिश करेगा, तो यही युवा उसे अस्वीकार कर देंगे।

उन्हें पता है कि उनका संघर्ष किससे है। उन्हें यह भी मालूम है कि सत्ता कितनी मजबूत है और वह क्या-क्या कर सकती है। फिर भी वे यहां केवल किसी एक नेता के आह्वान पर नहीं आए हैं। यह अब उनका अपना मंच है, उनकी अपनी लड़ाई है और उनका अपना आंदोलन है।

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