मिर्जा जाहिद बेग…
देश में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाने वाली परीक्षा नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट अर्थात नीट लाखों विद्यार्थियों के भविष्य का निर्धारण करती है। इस साल 2026 में भी इस परीक्षा में देशभर से लगभग 22 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। डॉक्टर बनने का $ख्वाब बुनने वाले इन विद्यार्थियों ने वर्षों के कठिन परिश्रम, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच इस परीक्षा की तैयारी की थी, लेकिन तंत्र की अक्षम्य लापरवाही के चलते पेपर लीक होने से इसे रद्द कर दिया गया है। पेपर लीक होने और अन्य अनियमितताओं के आरोपों ने पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
यदि किसी प्रतियोगी परीक्षा की निष्पक्षता ही संदिग्ध हो जाए तो यह केवल परीक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि देश के युवाओं के $ख्वाबों और उनके भविष्य के साथ क्रूर खिलवाड़ भी है। क्योंकि नीट जैसी परीक्षा केवल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका का नाम नहीं है। इसके पीछे लाखों परिवारों की उम्मीदें, त्याग और संघर्ष जुड़े होते हैं। एक मध्यमवर्गीय या निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा जब डॉक्टर बनने का सपना देखता है, तो पूरा परिवार उसके साथ उस सपने को जीने लगता है। माता-पिता,भाई-बहन अपनी जरूरतें कम कर देते हैं, कई बार कर्ज लेते हैं, गहने गिरवी रखते हैं और वर्षों तक बचत करके बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं।
ऐसे में जब परीक्षा में पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं और परीक्षा रद्द करने या पुनरू परीक्षा की नौबत आती है, तब सबसे अधिक चोट उन मेहनती विद्यार्थियों को पहुंचती है जिन्होंने ईमानदारी से दिन-रात परिश्रम किया होता है।
कल्पना कीजिए उस छात्र की मनरूस्थिति की जिसने महीनों तक मोबाइल, मनोरंजन और सामाजिक जीवन से दूरी बनाकर केवल पढ़ाई की हो। सिस्टम और सरकार पर भरोसा कर परीक्षा के दिन वह पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा केंद्र पहुंचा हो और बाद में उसे पता चले कि कुछ लोगों ने धन और पहुंच के बल पर प्रश्नपत्र पहले ही प्राप्त कर लिया था। यह समाचार उसके आत्मविश्वास को भीतर तक तोड़ देता है। कई विद्यार्थी मानसिक तनाव, अवसाद और असहायता का शिकार हो जाते हैं। अभिभावकों की स्थिति भी कम पीड़ादायक नहीं होती। उन्हें लगता है कि ईमानदारी और परिश्रम की कीमत इस व्यवस्था में शायद बची ही नहीं।
हम सब जानते हैं कि नीट की तैयारी आज अत्यंत महंगी प्रक्रिया बन चुकी है। देश के बड़े कोचिंग संस्थानों में दो वर्ष की तैयारी पर औसतन 2 लाख से 5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। कई महानगरों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल और भोजन का खर्च अलग से प्रतिमाह 10 से 20 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। पुस्तकों, टेस्ट सीरीज और अध्ययन सामग्री पर 20 से 50 हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। वर्ष 2026 में नीट आवेदन शुल्क सामान्य वर्ग के लिए लगभग 17 सौ रुपये तथा अन्य वर्गों के लिए अलग-अलग निर्धारित रहा। परीक्षा केंद्र दूसरे शहर में होने पर यात्रा, होटल और भोजन का अतिरिक्त खर्च भी परिवारों को उठाना पड़ता है।
इस प्रकार एक विद्यार्थी की तैयारी पर कुल मिलाकर औसतन 4 लाख से 9 लाख रुपये तक का आर्थिक बोझ पड़ता है। ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए यह राशि जीवनभर की जमा पूंजी के समान होती है। ऐसी स्थिति में यदि परीक्षा प्रक्रिया ही अविश्वसनीय हो जाए तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि अमानवीय अन्याय बन जाता है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इतनी संवेदनशील परीक्षा का प्रश्नपत्र आखिर बार-बार लीक कैसे हो जाता है? पिछले 10 सालों में दर्जनों परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं। जिसमें नीट परीक्षा भी शामिल हैं।
सहज ही सवाल उठता है कि क्या सुरक्षा तंत्र पर्याप्त नहीं है? क्या परीक्षा संचालन एजेंसियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए? आधुनिक तकनीक और डिजिटल निगरानी के इस युग में यदि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं रह पाता, तो यह व्यवस्था की अक्षम्य लापरवाही ही मानी जाएगी। नेशनल टेस्ट एजेंसी और सरकार को अब केवल सफाई देने के बजाय ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले परीक्षा प्रक्रिया को पूर्णतरू डिजिटल निगरानी के दायरे में लाया जाना चाहिए। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर वितरण तक हर स्तर पर बहुस्तरीय एन्क्रिप्शन और रियल टाइम ट्रैकिंग व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की लापरवाही सामने आए उन पर तत्काल सेवा समाप्ति और आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त जिन विद्यार्थियों को पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने से मानसिक तथा आर्थिक क्षति हुई है, उन्हें राहत देना भी आवश्यक है। यदि पुनरू परीक्षा आयोजित की जाती है तो विद्यार्थियों से दोबारा कोई शुल्क न लिया जाए। दूरदराज से आने वाले विद्यार्थियों के लिए यात्रा सहायता और परीक्षा केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए। गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए विशेष सहायता कोष बनाया जाए ताकि उनका एक और वर्ष बर्बाद न हो। रद्द परीक्षा को पुनः कराने के लिए जिन शहरों में परीक्षा केंद्र बनाए जाएं वहां परीक्षा सेंटर के आस-पास के छात्रावासों, होटलों और भोजनालयों के मालिकों से अपील की जानी चाहिए कि वे श्आपदा में अवसर्य के पूंजीवादी सिद्धांत को परे रख कर श्आपदा में इंसानियत्य के मानवीय सिद्धांत का अनुसरण करें और फिर से परीक्षा में सम्मिलित होने वाले परीक्षार्थियों को इस बार अपने प्रतिष्ठानों में अधिकतम छूट प्रदान करें।
आखिर को वतन के नागरिकों से मोहब्बत करना, मुसीबत में उनकी मदद करना ही सच्ची वतनपरस्ती है। सरकारों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा ऐसे विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन और काउंसलिंग व्यवस्था भी शुरू की जानी चाहिए, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव पहले ही अत्यधिक होता है। बच्चों को टूटने से बचाना सबकी जिम्मेदारी है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी परीक्षा में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। परीक्षा माफिया पर शिकंजा कसने के लिए राज्यों की पुलिस, साइबर एजेंसियों और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही ही जनता का विश्वास पुनरू स्थापित कर सकती है। नीट पेपर लीक मामला केवल एक परीक्षा रद्द होने तक सीमित नहीं है। दरअसल, यह देश के युवाओं के भविष्य, परिश्रम और विश्वास पर सीधा आघात है। जिन्होंने धन और प्रभाव के बल पर इस अपराध को अंजाम दिया है, वे केवल कानून नहीं तोड़ रहे, बल्कि लाखों मेहनती विद्यार्थियों के ख्घ्वाबों से खिलवाड़ कर उनके और राष्ट्र के भविष्य की हत्या कर रहे हैं।
ऐसे अपराधियों के विरुद्ध फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई कर कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या राष्ट्रद्रोही गिरोह विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का साहस न कर सके। देश के युवाओं को अपने सपनों को साकार करने का निष्पक्ष अवसर देना मात्र प्रशासनिक दायित्व ही नहीं, बल्कि सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। सरकार और तंत्र में बैठे परीक्षा हेतु सीधे जिम्मेदारों से फौरन इस्तीफा लिया जाए।
(लेखक सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं साहित्यकार हैं।)
