नई दिल्ली, 20 मार्च । पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक विमानन क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। हवाई क्षेत्र में अचानक लगी पाबंदियों, विमान ईंधन की बढ़ती कीमतों और भारी बीमा प्रीमियम ने एयरलाइंस की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने भारतीय विमान कंपनियों को सुरक्षा के मद्देनजर सख्त निर्देश जारी किए हैं। नियामक ने 28 मार्च तक बहरीन, ईरान, इराक, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात के हवाई क्षेत्रों से बचने की सलाह दी है।
डीजीसीए ने यह भी कहा है कि ओमान और सऊदी अरब के हवाई रास्तों का सीमित उपयोग किया जा सकता है, लेकिन 32,000 फीट से कम ऊंचाई पर उड़ान की अनुमति नहीं होगी। साथ ही, एयरलाइंस को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक योजना तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।
अधिकारियों के अनुसार, क्षेत्र में तेजी से बदलते हालात के कारण उड़ान संचालन बेहद जटिल हो गया है। कई बार विमानों को संभावित हमले के खतरे के चलते उतरने से पहले आसमान में लंबे समय तक चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे समय और ईंधन दोनों की खपत बढ़ती है।
सबसे बड़ा असर बीमा लागत पर पड़ा है। युद्ध जैसी स्थिति के चलते ‘वॉर रिस्क’ बीमा प्रीमियम में भारी उछाल आया है। एक उड़ान पर अतिरिक्त बीमा खर्च छोटे विमानों के लिए 30-40 लाख रुपये और बड़े विमानों के लिए 90 लाख से एक करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने विमान ईंधन को महंगा कर दिया है, जो एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च का लगभग 40 प्रतिशत होता है। इस अतिरिक्त बोझ को संतुलित करने के लिए कंपनियों ने यात्रियों पर ईंधन शुल्क बढ़ाना शुरू कर दिया है।
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने घरेलू टिकटों पर 399 रुपये का ईंधन शुल्क लागू किया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए भी दरों में वृद्धि की गई है।
वहीं इंडिगो 425 से 2,300 रुपये तक और अकासा एयर 199 से 1,300 रुपये तक का अतिरिक्त ईंधन शुल्क वसूल रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर न केवल हवाई किरायों पर पड़ेगा बल्कि वैश्विक विमानन उद्योग की स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
