लखनऊ: समाजवादी पार्टी (सपा) ने आगामी 15 मार्च को प्रदेश के सभी जिलों में कांशीराम जयंती मनाने का फैसला किया है। पार्टी का लक्ष्य जिलास्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में दलित समाज की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना है। इन आयोजनों के जरिए बसपा संस्थापक कांशीराम और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बीच रहे राजनीतिक संबंधों को भी प्रमुखता से याद किया जाएगा।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी जिला एवं महानगर पदाधिकारियों को निर्देश जारी कर कांशीराम जयंती पर व्यापक कार्यक्रम आयोजित करने को कहा है। पार्टी इस दिन को ‘पीडीए दिवस’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के रूप में मनाएगी।
दलित-पिछड़ा गठजोड़ पर फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा एक बार फिर दलित-पिछड़ा समीकरण को मजबूत कर अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। जेएनयू के सेवानिवृत्त शिक्षक और समकालीन राजनीति के जानकार प्रो. रवि के अनुसार, 1990 के दशक में मुलायम-कांशीराम फैक्टर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा सामाजिक और राजनीतिक बदलाव किया था। उस दौर में दलितों और पिछड़ों की राजनीतिक हैसियत मजबूत हुई थी।
सपा नेतृत्व का आकलन है कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों का साझा गठजोड़ उन्हें सत्ता तक पहुंचा सकता है। यही कारण है कि पार्टी कांशीराम जयंती को व्यापक राजनीतिक संदेश के साथ मना रही है।
ऐतिहासिक संदर्भ को किया जाएगा रेखांकित
जिलों में होने वाले कार्यक्रमों के दौरान यह भी याद दिलाया जाएगा कि कांशीराम ने मंडल आयोग की सिफारिशों के समर्थन में राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा किया था। वर्ष 1992 में मुलायम सिंह यादव के साथ समझौते के बाद ‘बहुजन समाज बनाओ’ अभियान को गति मिली। दिसंबर 1993 में कांशीराम के समर्थन से ही मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ था।
सपा के इस फैसले को आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है, जहां पार्टी सामाजिक न्याय और पीडीए फार्मूले के जरिए अपने आधार को और मजबूत करने की कोशिश में जुटी है।
