पांच लाख रुपये मासिक वेतन के बाद भी नहीं टिक रहे डॉक्टर, यूपी में 40 फीसदी पद खाली

लखनऊ, 10 जून (यूएनएस)। उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी लगातार बनी हुई है। स्थिति यह है कि प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) संवर्ग के करीब 18,500 स्वीकृत पदों में से लगभग 7,500 पद खाली हैं। यानी करीब 40 प्रतिशत पदों पर डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी दूर करने के लिए सरकार वैकल्पिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ नए भर्ती बोर्ड के गठन की तैयारी कर रही है।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पीएमएस संवर्ग के करीब 18,500 पद स्वीकृत हैं। इनमें लगभग 11 हजार चिकित्सक कार्यरत हैं, जबकि 7,500 पद रिक्त चल रहे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों के करीब 2,500 पदों पर भर्ती के लिए प्रस्ताव पहले ही उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को भेजा जा चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी का स्तर करीब 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

विशेषज्ञों की कमी को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत रिवर्स बिडिंग व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत विशेषज्ञ चिकित्सकों को पांच लाख रुपये प्रतिमाह तक के मानदेय पर नियुक्त किया जा रहा है। पिछले वर्ष लगभग 170 विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती की गई थी, जिन्हें चयनित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) में तैनात किया गया।

इसके अलावा जनवरी 2026 में वॉक-इन-इंटरव्यू के माध्यम से संविदा पर 710 डॉक्टरों की भर्ती के लिए साक्षात्कार भी आयोजित किए गए। वहीं, चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विभाग ने सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष कर दी है।

चिकित्सकों की कमी दूर करने को बनेगा नया भर्ती बोर्ड

चिकित्सकों की भर्ती में होने वाली देरी और बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड के गठन का निर्णय लिया है। यह बोर्ड एमडी-एमएस डिग्रीधारी विशेषज्ञ चिकित्सकों की सीधी भर्ती करेगा। साथ ही एमबीबीएस चिकित्सकों की पदोन्नति प्रक्रिया भी इसी बोर्ड के माध्यम से पूरी की जाएगी।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार हर वर्ष करीब 200 से 250 विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में की जाती है, लेकिन इनमें से लगभग 25 प्रतिशत चिकित्सक कुछ समय बाद ही नौकरी छोड़ देते हैं या अनुपस्थित हो जाते हैं। लंबे समय तक गैरहाजिर रहने पर उन्हें नोटिस जारी किए जाते हैं और वापस न लौटने पर सेवा समाप्त कर पद रिक्त घोषित कर दिया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी छोड़ने वाले कई विशेषज्ञ चिकित्सकों का कहना है कि उन्हें आवास, बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और चिकित्सा सेवाओं के लिए आवश्यक संसाधनों जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। वहीं निजी अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं के साथ आकर्षक वेतन मिलने के कारण वे सरकारी सेवा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने कहा कि प्रदेश में विभिन्न स्तरों पर चिकित्सकों की भर्ती प्रक्रिया जारी है। नए भर्ती बोर्ड के गठन के साथ-साथ नए मेडिकल कॉलेजों से निकलने वाले विशेषज्ञ चिकित्सक भी सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले एक-दो वर्षों में अधिकांश रिक्त पदों को भर लिया जाएगा और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।

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