अनुभव सिन्हा की 5 फिल्में जो भारतीय कानून और सिस्टम पर उठाती हैं बड़े सवाल

फिल्मकार अनुभव सिन्हा ने हिंदी सिनेमा में ऐसी फिल्मों की एक अलग धारा बनाई है, जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं बल्कि समाज, कानून और सत्ता के ढांचे पर गंभीर सवाल भी उठाती हैं। उनकी कई फिल्में भारतीय न्याय व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सच्चाइयों के बीच के अंतर को बेबाकी से सामने लाती हैं। आइए नजर डालते हैं उनकी 5 अहम फिल्मों पर:


1. हसीन दिलरुबा
यह एक मर्डर मिस्ट्री के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं को भी दिखाती है। फिल्म में सबूत, बयान और परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर न्याय कैसे प्रभावित होता है, इसे दिलचस्प तरीके से पेश किया गया है। तापसी पन्नू के अभिनय ने इसे और प्रभावशाली बनाया।


2. आर्टिकल 15
वास्तविक घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। फिल्म दिखाती है कि जमीनी हकीकत में जातिगत भेदभाव कैसे अब भी मौजूद है और कानून होने के बावजूद न्याय पाना कितना कठिन हो सकता है।


3. थप्पड़
एक साधारण लगने वाली घरेलू हिंसा की घटना—एक थप्पड़—कैसे कानूनी और नैतिक बहस में बदल जाती है, यह फिल्म बखूबी दिखाती है। यह व्यक्तिगत गरिमा, विवाह में समानता और महिलाओं के अधिकारों पर गंभीर प्रश्न उठाती है।


4. मुल्क
यह फिल्म पहचान, धर्म और न्याय के मुद्दों को केंद्र में रखती है। एक मुस्लिम परिवार पर लगे आतंकवाद के आरोप के बीच कोर्टरूम ड्रामा के जरिए यह दिखाया गया है कि पूर्वाग्रह कैसे न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।


5. भीड़
कोविड-19 लॉकडाउन की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म सीधे तौर पर अदालत की कहानी नहीं है, लेकिन यह दिखाती है कि संकट के समय कानून और प्रशासनिक फैसलों का आम लोगों पर क्या असर पड़ता है। खासकर मजदूरों की स्थिति और उनके संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा इसमें उभरकर आता है।

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