नई दिल्ली, 25 जून। पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानने को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच नई बहस छिड़ गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का पक्का प्रमाण नहीं माना जा सकता, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सरकार से सवाल पूछा है कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो फिर नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज मान्य होगा।
केंद्र सरकार ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि यह कोई नई नीति नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार ने कहा कि न तो हाल में और न ही पिछले 12 वर्षों में इस संबंध में कोई नया निर्णय लिया गया है। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 का हवाला देते हुए सरकार ने बताया कि विशेष परिस्थितियों में जनहित को देखते हुए गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं।
सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के वर्ष 2013 के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया था कि पासपोर्ट होना मात्र नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
विदेश मंत्रालय के बयान के बाद राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो आम नागरिक आखिर किस दस्तावेज के आधार पर अपनी नागरिकता साबित करेगा। उन्होंने आशंका जताई कि यदि स्थानीय स्तर पर नागरिकता को लेकर संदेह पैदा किया गया तो इससे मताधिकार जैसे संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं भाजपा नेता अमित मालवीय ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विदेश मंत्रालय ने कोई नई नीति घोषित नहीं की है। उन्होंने कहा कि अदालतें पहले भी कई बार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। नागरिकता का निर्धारण जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता की नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड, मतदाता सूची, शैक्षणिक अभिलेख, सरकारी सेवा रिकॉर्ड, भूमि एवं संपत्ति के दस्तावेज और अन्य सरकारी अभिलेखों सहित विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
मालवीय ने कहा कि पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण पहचान और यात्रा दस्तावेज जरूर है, लेकिन नागरिकता का अधिकार संविधान और नागरिकता अधिनियम से प्राप्त होता है, किसी एक दस्तावेज से नहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा विवाद किसी नए नियम को लेकर नहीं, बल्कि पहले से स्थापित कानूनी स्थिति को लेकर पैदा किया जा रहा है।
गौरतलब है कि यह बहस उस समय तेज हुई है जब विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्टीकरण दिया था। इसके बाद नागरिकता और दस्तावेजों की वैधता को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
