लखनऊ। उत्तर प्रदेश में एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। “एक डोज, दो जिंदगी का वरदान” के संदेश के साथ स्वास्थ्य विभाग और Global Health Strategies द्वारा लखनऊ में राज्य स्तरीय मीडिया संवेदीकरण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता अपर मुख्य सचिव (चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) अमित कुमार घोष ने की।
कार्यशाला में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ, सहयोगी संस्थाएं और मीडिया प्रतिनिधि शामिल हुए। इस दौरान एनीमिया मुक्त भारत अभियान को प्रभावी बनाने में मीडिया की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया।
एनीमिया नियंत्रण पर सरकार की प्राथमिकता
अमित कुमार घोष ने कहा कि राज्य सरकार एनीमिया की दर कम करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत एनीमिया नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है। एएनएम, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन, डीवॉर्मिंग, पोषण परामर्श और जांच सेवाओं को मजबूत किया गया है।
उन्होंने बताया कि गंभीर एनीमिया से ग्रस्त गर्भवती महिलाओं के इलाज के लिए इंट्रावीनस आयरन (फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज) जैसी आधुनिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसकी एक खुराक से प्रभावी उपचार संभव है। वर्ष 2026 में राज्य ने ऐसी 3.7 लाख खुराकें खरीदी हैं।
6×6×6 मॉडल से मिल रहे सकारात्मक परिणाम
राज्य में एनीमिया नियंत्रण के लिए 6×6×6 मॉडल लागू किया गया है, जिसमें 6 लाभार्थी समूह, 6 प्रमुख हस्तक्षेप और 6 संस्थागत व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसके अंतर्गत छोटे बच्चे, स्कूली बच्चे, किशोर-किशोरियां, प्रजनन आयु की महिलाएं, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को शामिल किया गया है। यह मॉडल प्रदेश के सभी 75 जिलों में लागू है।
प्रशिक्षण पर विशेष जोर
महानिदेशक प्रशिक्षण डॉ. रंजना खरे ने बताया कि कार्यक्रम की सफलता के लिए स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण बेहद जरूरी है। अब तक 10,000 से अधिक जिला और ब्लॉक स्तर के चिकित्सा अधिकारियों व स्टाफ नर्सों को नवीन प्रोटोकॉल पर प्रशिक्षित किया जा चुका है।
आंकड़ों में सुधार के संकेत
महानिदेशक परिवार कल्याण डॉ. हरिदास अग्रवाल के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों में सुधार देखने को मिला है—
- गर्भवती महिलाओं में एनीमिया 52% से घटकर 46%
- किशोरियों में 56.5% से घटकर 52.9%
- बच्चों (6-59 माह) में 73.9% से घटकर 66.4%
साथ ही, गर्भवती महिलाओं में आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन की कवरेज 95% तक पहुंच गई है।
जागरूकता और जांच पर फोकस
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की प्रो. डॉ. मोनिका अग्रवाल ने बताया कि एनीमिया की शुरुआत अक्सर किशोरावस्था में ही हो जाती है, इसलिए समय पर जांच और संतुलित पोषण बेहद जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त पोषण आवश्यक होता है।
मीडिया से सहयोग की अपील
अधिकारियों ने मीडिया से अपील की कि वे एनीमिया के लक्षण, रोकथाम और उपचार के बारे में लोगों को जागरूक करने में सक्रिय भूमिका निभाएं। इससे अधिक से अधिक लोग समय पर जांच और उपचार के लिए आगे आएंगे।
कार्यशाला में UNICEF, न्यूट्रिशन इंटरनेशनल, सीफार, स्मार्ट एनजीओ सहित कई संस्थाओं के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
सरकार का मानना है कि समन्वित प्रयासों से न केवल एनीमिया पर नियंत्रण पाया जा सकेगा, बल्कि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाकर एक स्वस्थ समाज का निर्माण भी संभव होगा।
