विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष: जैव-विविधता के माध्यम से बचाया जा सकता है पर्यावरण

सुदर्शन सोलंकी

प्रकृति केवल एक संसाधन नहीं है, जिसका हम अपनी इच्छा से अनियंत्रित दोहन करते रहें, बल्कि यह वह जीवन-आधार है जिसके बिना हमारा अपना कोई वजूद नहीं है। यदि हमने समय रहते अपने जंगलों, नदियों, सूक्ष्मजीवों और वन्यजीवों को नहीं बचाया, तो मानव सभ्यता का अंत किसी युद्ध से नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन के बिगड़ने से हो जाएगा।

जैव-विविधता पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीवों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, सूक्ष्मजीवों और उनके बीच के जटिल प्राकृतिक संतुलन का नाम है। हमारा मानव जीवन पूरी तरह से इसी ताने-बाने पर टिका हुआ है।

विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो जैव-विविधता हमारे अस्तित्व के लिए कई स्तरों पर अपरिहार्य है। दुनिया की लगभग आधी आधुनिक दवाइयाँ और एंटीबायोटिक्स प्राकृतिक स्रोतों, वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों से विकसित की गई हैं। प्रयोगशालाओं में बनने वाले रसायनों का आधार भी अक्सर प्रकृति ही होती है। कृषि, मत्स्य पालन, पर्यटन और वनीकरण पर आधारित उद्योग दुनिया भर के करोड़ों लोगों को आजीविका और रोजगार प्रदान करते हैं। जैव-विविधता के क्षरण का सीधा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के पतन के रूप में सामने आएगा।

घने जंगल कार्बन सिंक का कार्य करते हैं। ये वातावरण से हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित रखने और ग्लोबल वार्मिंग से सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विनाश की कगार पर दुनिया

संयुक्त राष्ट्र संघ और विभिन्न पर्यावरण संगठनों की हालिया रिपोर्टें जो आंकड़े प्रस्तुत कर रही हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं। आज पूरी दुनिया जैव-विविधता के अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में लगभग 10 लाख प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। डोडो पक्षी और तस्मानियन टाइगर जैसे जीव तो पहले ही धरती से गायब हो चुके हैं।

भारत की बात करें तो यहाँ की शान कहे जाने वाले जीव, जैसे—गोडावण, गिद्ध, लाल पांडा और हिम तेंदुआ आज गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। जैव-विविधता के इस तेजी से होते विनाश के पीछे कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि इंसान की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएँ, आधुनिक जीवनशैली और प्रकृति के चक्र में सीधा हस्तक्षेप है।

इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं—

तीव्र वनोन्मूलन

वैश्विक स्तर पर हो रही अंधाधुंध कटाई के कारण हर वर्ष दुनियाभर में करीब 1 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो रहा है। इससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त हो रहा है और वे मानव बस्तियों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। जब किसी जीव का प्राकृतिक घर ही छीन लिया जाएगा, तो उसका अस्तित्व संकट में आना निश्चित है।

प्रदूषण और प्लास्टिक का अभिशाप

हमारी नदियाँ और समुद्र औद्योगिक कचरे के कारण अत्यधिक प्रदूषित हो चुके हैं। रासायनिक अपशिष्टों और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह तबाह कर दिया है। समुद्री जीव अनजाने में इस प्लास्टिक को निगल रहे हैं, जिससे पूरी खाद्य-श्रृंखला दूषित और प्रभावित हो रही है।

अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप और कृत्रिम जलवायु परिवर्तन

जैव-विविधता के संकट को बढ़ाने में इंसान का सीधा हस्तक्षेप सबसे अधिक जिम्मेदार है। वन्यजीवों के अंगों की तस्करी, खाल, सींग और हड्डियों के लिए किया जाने वाला अवैध शिकार इंसानी लालच का सबसे क्रूर चेहरा है।

इसके अलावा औद्योगिक क्रांति के बाद से जीवाश्म ईंधनों (कोयला और तेल) के अंधाधुंध उपयोग, अनियंत्रित उत्सर्जन और कंक्रीट के विस्तार के कारण मानव-जनित जलवायु परिवर्तन हुआ है। वैश्विक तापमान में यह वृद्धि पूरी तरह मानवीय गतिविधियों की देन है। इसके कारण मौसम का चक्र इतनी तेजी से बदला है कि मूक जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को संभलने या स्वयं को नए माहौल में ढालने का अवसर ही नहीं मिल रहा, जिससे वे सामूहिक विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।

मेगा-डायवर्सिटी और बड़ी चुनौतियाँ

भारत दुनिया के उन भाग्यशाली 17 “मेगा-डायवर्सिटी” देशों में शामिल है, जहाँ जैव-विविधता का अनमोल खजाना मौजूद है। हमारे पास पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत जैसे वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट हैं। अरावली पर्वतमाला, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान और थार मरुस्थल जैसे विशिष्ट इकोसिस्टम दुर्लभ जीवों को आश्रय देते हैं।

लेकिन इस संपदा पर खतरा भी उतना ही बड़ा है। यदि यह विविधता नष्ट होती है, तो भारत में खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और मानव स्वास्थ्य पर ऐसा संकट खड़ा होगा, जिससे निपटना अत्यंत कठिन हो जाएगा। परागणकर्ताओं (मधुमक्खियाँ और तितलियाँ) के समाप्त होने से फसलों का उत्पादन गिर जाएगा, जिससे कृषि प्रधान देश में खाद्यान्न संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

संरक्षण के प्रयास

भारत सरकार ने समय-समय पर प्रकृति को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और नीतियाँ बनाई हैं।

बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट, 2002 के माध्यम से जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को कानूनी ढाँचा प्रदान किया गया है। प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट जैसी योजनाओं ने बाघों और हाथियों की आबादी को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नमामि गंगे और ग्रीन इंडिया मिशन जैसी वृहद परियोजनाएँ नदियों को पुनर्जीवित करने और वनीकरण को बढ़ावा देने के लिए संचालित की जा रही हैं।

हमें क्या करना होगा?

स्थानीय स्तर पर बदलाव

हमें अपनी जीवनशैली से प्लास्टिक का अधिकतम बहिष्कार करना होगा। कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण और जल संरक्षण को अपनी आदत बनाना होगा।

सामुदायिक भागीदारी

ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को वनों और वन्यजीवों के संरक्षण से जोड़ना होगा। जब तक स्थानीय नागरिकों को पर्यावरण बचाने का आर्थिक या सामाजिक लाभ नहीं दिखेगा, तब तक स्थायी बदलाव संभव नहीं है।

सतत विकास

विकास की नीतियाँ ऐसी होनी चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हों। अवसंरचना परियोजनाओं को ग्रीन कॉरिडोर और पर्यावरण-अनुकूल डिजाइनों के साथ जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

यदि हम आज भी सचेत नहीं हुए, तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियाँ बाघ, हाथी, गिद्ध और रंग-बिरंगी तितलियों को वास्तविक धरातल पर नहीं, बल्कि केवल किताबों और डिजिटल अभिलेखागारों की आभासी दुनिया में ही देख पाएँगी।

जैव-विविधता का नुकसान किसी एक देश या जाति की क्षति नहीं है, यह पूरी मानवता के वजूद पर लगा प्रश्नचिह्न है। प्रकृति के इस ताने-बाने को बचाना परोपकार नहीं, बल्कि स्वयं को जीवित रखने का एकमात्र स्वार्थ होना चाहिए।

आइए, इस वर्ष हम केवल वैचारिक विमर्श न करें, बल्कि अपने स्तर पर एक छोटा ही सही, लेकिन ठोस कदम उठाएँ। क्योंकि जब प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।

(लेखक विज्ञान विषयों के लेखक एवं ब्लॉगर हैं।)

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