मुंबई। भारतीय रुपया बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कारोबार के दौरान अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 95.80 तक टूट गया। हालांकि बाद में मामूली सुधार दर्ज करते हुए रुपया 95.67 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ।
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक के संभावित हस्तक्षेप तथा सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाए जाने से रुपये को निचले स्तरों पर कुछ सहारा मिला।
कारोबारियों का कहना है कि वर्ष 2026 में रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है और अब तक इसमें छह प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। इसके पीछे महंगा कच्चा तेल, मजबूत अमेरिकी डॉलर और पश्चिम एशिया संकट को लेकर बढ़ती चिंताएं प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 95.52 प्रति डॉलर पर खुला। कारोबार के दौरान इसमें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला और एक समय यह 95.80 प्रति डॉलर तक गिर गया। बाद में कुछ सुधार के साथ यह 95.67 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में एक पैसा मजबूत रहा।
मंगलवार को रुपया 40 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 95.68 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था।
कोटक सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख (जिंस एवं मुद्रा) अनिंद्य बनर्जी ने कहा कि डॉलर के मुकाबले रुपये का 95.60 के आसपास बने रहना इस बात का संकेत है कि ऊंचे कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का दबाव लगातार बना हुआ है।
उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक का सक्रिय हस्तक्षेप और सोने के आयात में कमी रुपये में और अधिक कमजोरी को सीमित कर सकती है। आने वाले समय में रुपये की दिशा मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर निर्भर करेगी।
