प्रयागराज, 27 जून 2026 (यूएनएस)। उत्तर प्रदेश में पंचायत व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किया गया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया इस व्यवस्था को संविधान और पंचायती राज व्यवस्था की भावना के विपरीत माना तथा राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत जवाब मांगा है। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई तय की गई है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में राज्य सरकार के 25 मई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके माध्यम से ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उन्हें पंचायत चुनाव होने तक संबंधित ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त कर दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधि का अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है और उसे प्रशासनिक अधिकार सौंपना संविधान के 73वें संशोधन तथा पंचायती राज अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे। अदालत ने पूछा कि जब ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है तो उन्हें किस वैधानिक अधिकार के आधार पर प्रशासक बनाया गया। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया सरकार का आदेश पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्देशों के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। अदालत ने संकेत दिया कि यदि संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति भी सुनिश्चित कराई जा सकती है।
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि पंचायत चुनावों की तैयारियां आगे बढ़ रही हैं और मतदाता सूची 10 जून को प्रकाशित की जा चुकी है। आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया कि चुनाव कराने की दिशा में आवश्यक प्रक्रिया जारी है। इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पंचायत चुनाव कराने की संभावित समय-सीमा, ओबीसी आरक्षण से संबंधित स्थिति तथा चुनाव कार्यक्रम के संबंध में विस्तृत जानकारी अगली सुनवाई तक प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। चुनाव तत्काल नहीं होने की स्थिति में पंचायती राज विभाग ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंजूरी के बाद आदेश जारी कर सभी वर्तमान ग्राम प्रधानों को संबंधित ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त कर दिया था, ताकि विकास कार्य और प्रशासनिक गतिविधियां बाधित न हों। सरकार के इस निर्णय को ग्रामीण प्रशासन में निरंतरता बनाए रखने का प्रयास बताया गया था, जबकि विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों ने इसे संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत करार दिया था।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद प्रदेश की हजारों ग्राम पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब राज्य सरकार के जवाब और 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं। अदालत का अंतिम निर्णय न केवल ग्राम प्रधानों की प्रशासनिक भूमिका बल्कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों की समय-सीमा और आगे की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
