लखनऊ,26 जून 2026। करीब छह महीने की लंबी कवायद, लखनऊ से दिल्ली तक चली बैठकों और संगठन के भीतर कई दौर के मंथन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने आखिरकार उत्तर प्रदेश संगठन की नई टीम का ऐलान कर दिया। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की घोषित टीम में नए और पुराने चेहरों का मिश्रण, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश तथा प्रभावशाली नेताओं के बीच सामंजस्य की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। हालांकि, इस पूरी कवायद के बावजूद प्रतिनिधित्व और संतुलन को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव में अब लगभग छह महीने का समय शेष है। ऐसे में भाजपा ने संगठन में बड़े बदलाव करते हुए वर्षों से महत्वपूर्ण पदों पर जमे कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया है, जबकि नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर संगठन में नई ऊर्जा भरने का प्रयास किया गया है। कुछ नेताओं को पदोन्नति देकर कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश भी की गई है कि संगठन में काम करने वालों के लिए अवसर खुले हैं।
हालांकि नई टीम के गठन में पार्टी के शीर्ष नेताओं का प्रभाव भी साफ दिखाई देता है। विधान परिषद सदस्य विजय बहादुर पाठक और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र एवं नोएडा विधायक पंकज सिंह को संगठन में जगह नहीं मिली, जबकि उनके छोटे भाई नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया। राजनीतिक जानकार इसे संगठनात्मक फैसलों पर वरिष्ठ नेतृत्व के प्रभाव के रूप में देख रहे हैं।
जातीय संतुलन की कोशिश, लेकिन पूरी तरह सफल नहीं
भाजपा ने अपनी नई टीम में पिछड़े, अति पिछड़े और अनुसूचित जाति वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरण को मजबूत करने का प्रयास किया है। अगड़े और पिछड़े वर्ग के बीच भी संतुलन साधने की कोशिश की गई है, लेकिन आबादी के अनुपात के लिहाज से प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विशेष रूप से ब्राह्मण समाज को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में तेज है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 12 से 14 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, जबकि भूमिहार और त्यागी समाज की आबादी लगभग एक प्रतिशत है। इसके बावजूद 48 सदस्यीय नई टीम में चार भूमिहार नेताओं को जगह मिली है, जबकि ब्राह्मण समाज को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ है।
महिलाओं की हिस्सेदारी भी लक्ष्य से कम
भाजपा लंबे समय से संगठन में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी देने की बात करती रही है, लेकिन नई प्रदेश टीम इस कसौटी पर भी पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी। 48 सदस्यीय टीम में केवल 12 महिलाओं को ही स्थान मिला है, जबकि 33 प्रतिशत हिस्सेदारी के हिसाब से यह संख्या 16 होनी चाहिए थी। इसे लेकर भी संगठन के भीतर चर्चा बनी हुई है।
दूसरे दलों से आए नेताओं को भी मिला इनाम
नई टीम में उन नेताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है, जिन्होंने हाल के वर्षों में भाजपा का दामन थामा या पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2022 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बनीं पूजा पाल को भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में पार्टी के पक्ष में मतदान करने के बाद प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर बड़ा संदेश दिया है।
इसी तरह पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरेश राणा को लंबे समय बाद फिर संगठन की मुख्यधारा में लाते हुए प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाने का उन्हें यह पुरस्कार मिला है।
लखनऊ और बाराबंकी को विशेष तवज्जो
नई टीम में कुछ जिलों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिला है। विशेष रूप से लखनऊ और बाराबंकी को संगठन में खास महत्व दिया गया है।
बाराबंकी से पूर्व सांसद प्रियंका रावत को प्रदेश उपाध्यक्ष, पूर्व सांसद उपेंद्र रावत को प्रदेश महामंत्री तथा अवधेश श्रीवास्तव को प्रदेश मंत्री बनाया गया है। एक ही जिले और एक ही सामाजिक वर्ग से दो प्रमुख नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिलने को राजनीतिक विश्लेषक संगठनात्मक संतुलन से अधिक प्रभावशाली नेताओं के बीच समन्वय और समझौते का परिणाम मान रहे हैं।
उपेंद्र रावत की नियुक्ति विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले एक कथित आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने के बाद उनका टिकट काट दिया गया था। हालांकि बाद में फोरेंसिक जांच में वीडियो में उनकी आवाज की पुष्टि नहीं हो सकी थी। ऐसे में उन्हें प्रदेश महामंत्री बनाए जाने को संगठन का बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
चुनावी रणनीति की पहली परीक्षा
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि नई टीम 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को बूथ स्तर तक गति देगी। संगठन में नई ऊर्जा, सामाजिक विस्तार और चुनावी प्रबंधन को ध्यान में रखकर टीम तैयार की गई है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई टीम में जातीय प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और महिलाओं की भागीदारी को लेकर उठ रहे सवाल विपक्ष को भाजपा पर निशाना साधने का अवसर भी दे सकते हैं। अब यह देखना होगा कि पंकज चौधरी की नई टीम संगठन को कितना मजबूत कर पाती है और 2027 के चुनावी रण में भाजपा की रणनीति को कितनी सफलता दिला पाती है।
