जहरीली होती जमीन?

राजकुमार सिन्हा…..

देश की उपजाऊ मिट्टी में रसायनों का जहर धीरे-धीरे घुलता जा रहा है। खेतों की उर्वरता घट रही है और कई क्षेत्रों में भूमि बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट (2025-26) के अनुसार, सर्वाधिक डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की खपत वाले देश के शीर्ष 100 जिलों में मध्यप्रदेश के 11 जिले शामिल हैं। इससे स्पष्ट होता है कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के मामले में मध्यप्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बन गया है।

इस सूची में शामिल अधिकांश जिले वे हैं, जहां ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। विशेष रूप से नर्मदा तटवर्ती क्षेत्रों के होशंगाबाद (नर्मदापुरम), सीहोर, हरदा और जबलपुर जैसे जिलों में मूंग की खेती के लिए डीएपी, यूरिया और रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट बताती है कि 91 प्रतिशत किसानों को कृषि विभाग की ओर से उर्वरकों के संतुलित उपयोग संबंधी कोई प्रशिक्षण या परामर्श नहीं मिला।

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 16 प्रतिशत योगदान देते हैं तथा 46 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका का आधार हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए देश में प्रतिवर्ष लगभग 601 लाख मीट्रिक टन रासायनिक उर्वरकों और 55 से 60 हजार टन रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। भारत दुनिया में उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1950-51 में भारतीय किसान मात्र सात लाख टन रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते थे। समय के साथ यह मात्रा कई गुना बढ़ चुकी है। उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। यूरिया के कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ओमान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात से आता है। वहीं डीएपी के आयात में अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और अन्य प्रमुख समुद्री मार्गों में किसी भी प्रकार की बाधा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है, जो यूरिया और डीएपी उत्पादन के लिए आवश्यक है। बढ़ती आयात लागत और प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों के कारण भारत सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2026 में यह सब्सिडी 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग केवल फसलों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डालता है। अनाज, फल और सब्जियों के माध्यम से रासायनिक अवशेष मानव शरीर में पहुंचकर विभिन्न प्रकार की बीमारियों को जन्म दे रहे हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के अनुसार, रासायनिक खादों के बढ़ते उपयोग के कारण देश की लगभग 30 प्रतिशत कृषि भूमि बंजर होने की स्थिति में पहुंच रही है। यूरिया के अत्यधिक उपयोग ने नाइट्रोजन चक्र को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इससे उत्पन्न नाइट्रस ऑक्साइड एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूजल और पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहे हैं।

भारतीय कृषि इतिहास में वर्ष 1967-68 में शुरू हुई हरित क्रांति एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। अधिक उत्पादन देने वाले बीजों, सिंचाई सुविधाओं, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के व्यापक उपयोग ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया। लेकिन 1980 के दशक के बाद हरित क्रांति के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे। खेती की लागत बढ़ती गई और किसान कर्ज के बोझ तले दबने लगे। कई क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं भी इसी संकट से जुड़ी रहीं।

आज यह केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। भारत के सामने चुनौती है कि वह पर्यावरण संरक्षण, बढ़ती जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकताओं और कृषि उत्पादन के बीच संतुलन स्थापित करे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी उपाय जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में धीरे-धीरे और वैज्ञानिक तरीके से कमी लाना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है। इसके लिए जैव-उर्वरक, जैविक खाद, कंपोस्ट, नैनो उर्वरक और भविष्य में ग्रीन अमोनिया जैसे विकल्प महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

प्राकृतिक खेती, जिसे शून्य बजट खेती या बिना बाहरी निवेश वाली खेती भी कहा जाता है, मिट्टी के प्राकृतिक जैविक तंत्र को मजबूत करने पर आधारित है। इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम की जाती है तथा मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है। अध्ययनों के अनुसार, प्राकृतिक खेती से कार्बन उत्सर्जन में 35 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।

खेती और मिट्टी को बचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने जून 2026 में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में 1 जून से 30 जून 2026 तक पूरे देश में “खेत बचाओ अभियान” चलाया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मिट्टी की घटती उर्वरता को बचाना और खेती की लागत को कम करना है।

इसके अलावा वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में शुरू की गई प्रधानमंत्री-प्रणाम योजना के तहत रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने वाले राज्यों को प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है। इस योजना के अंतर्गत उर्वरक सब्सिडी में होने वाली बचत को स्थानीय विकास परियोजनाओं में निवेश किया जाएगा। साथ ही राज्यों से उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और प्रभावी वितरण को सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।

देश के लगभग 15 करोड़ किसानों में से केवल 40 लाख किसान ही वर्तमान में जैविक खेती कर रहे हैं। इस क्षेत्र में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान अग्रणी राज्यों में शामिल हैं। सिक्किम वर्ष 2016 में ही पूर्ण रूप से जैविक खेती वाला राज्य बन चुका है।

किसान एवं कृषि कल्याण विभाग के अनुसार, मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख टन जैविक उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिनमें से पांच लाख टन से अधिक उत्पादों का निर्यात किया जाता है। भारत में जैविक उत्पादों की मांग और उत्पादन दोनों लगातार बढ़ रहे हैं। वर्तमान में भारतीय जैविक बाजार का आकार लगभग 16,800 करोड़ रुपये का है।

देश में डीएपी और यूरिया की बढ़ती खपत इस बात का संकेत है कि भारतीय खेती धीरे-धीरे रासायनिक निर्भरता के ऐसे चक्र में फंसती जा रही है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होगा। यदि आज मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और किसानों की आर्थिक स्थिति को बचाने के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मिट्टी को बचाना केवल खेती बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि देश के भविष्य और खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने की भी अनिवार्य शर्त है।

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