राम मंदिर दान प्रकरण में जांच की बड़ी चुनौती: सीसीटीवी रिकॉर्ड सीमित, बैंकिंग व्यवस्था और भूमि खरीद भी जांच के घेरे में

अयोध्या/लखनऊ। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की राशि और कीमती आभूषणों में कथित हेरफेर के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए सवाल सामने आ रहे हैं। विशेष जांच दल (एसआईटी) के सामने सबसे बड़ी चुनौती ठोस साक्ष्य जुटाने की है, क्योंकि मंदिर परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों का बैकअप केवल 45 दिनों तक ही सुरक्षित रहता है। ऐसे में यह पता लगाना आसान नहीं है कि कथित गड़बड़ी कब से और किस स्तर तक होती रही।

जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार एसआईटी अब तकनीकी साक्ष्यों के साथ-साथ कर्मचारियों, पदाधिकारियों और संदिग्ध व्यक्तियों के बयानों को भी महत्वपूर्ण आधार मान रही है। फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद से सीसीटीवी प्रणाली की जांच कराई जाएगी, ताकि उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड से अधिकतम जानकारी निकाली जा सके।

सीसीटीवी फुटेज बनी जांच की सबसे कमजोर कड़ी

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि मंदिर परिसर के कैमरों में केवल डेढ़ महीने का बैकअप सुरक्षित रहता है। उन्होंने बताया कि कुछ कर्मचारियों द्वारा नकदी की गड्डियां अलग रखने के संकेत मिले हैं, लेकिन पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण यह तय करना कठिन है कि कथित हेरफेर कितने समय से चल रहा था।

पूर्व ट्रस्ट पदाधिकारी महिपाल सिंह ने इससे पहले आरोप लगाया था कि कई महीनों की सीसीटीवी फुटेज हटाई गई थी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संबंधित रिकॉर्ड पहले ही स्वतः नष्ट हो चुका है तो उस आरोप को प्रमाणित करना बेहद कठिन होगा। फिर भी हाल के दिनों में किसी प्रकार की छेड़छाड़ हुई है या नहीं, इसकी गहन तकनीकी जांच की जा रही है।

संदिग्धों के बयान बनेंगे जांच का आधार

सूत्रों के अनुसार एसआईटी ने उन कर्मचारियों और संदिग्ध व्यक्तियों से भी पूछताछ शुरू कर दी है जिन पर प्रारंभिक स्तर पर संदेह जताया गया था। पूछताछ के दौरान कई विरोधाभासी तथ्य सामने आए हैं। जांच एजेंसी यह जानने का प्रयास कर रही है कि नकदी और आभूषणों के प्रबंधन की प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे और कथित गड़बड़ी का दायरा कितना बड़ा है।

बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने लंबे समय से हेरफेर होने की बात स्वीकार की है। यदि यह तथ्य जांच में पुष्ट होते हैं तो मामला केवल हालिया चोरी तक सीमित न रहकर कहीं अधिक व्यापक रूप ले सकता है।

बैंक कर्मियों की भूमिका पर भी उठे सवाल

जांच के दौरान बैंकिंग व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है। मंदिर में प्राप्त दान राशि की गणना और बैंक में जमा कराने की प्रक्रिया में बैंक कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके बावजूद कथित अनियमितताओं पर समय रहते रोक नहीं लग सकी।

सूत्रों का कहना है कि बैंक ने यह कार्य एक निजी एजेंसी को सौंप रखा था, जो आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की नियुक्ति करती थी। आरोप है कि इस प्रक्रिया में ऐसे लोगों को भी शामिल किया गया जो ट्रस्ट से जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों के करीबी थे। यही कारण है कि निगरानी व्यवस्था प्रभावी नहीं रह सकी।

नृपेंद्र मिश्र ने भी संकेत दिया कि बैंक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन अपेक्षित गंभीरता से नहीं कर पाया। उन्होंने भविष्य में अधिक अनुभवी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया।

सोना-चांदी और आभूषणों के रिकॉर्ड की भी पड़ताल

एसआईटी केवल नकदी तक सीमित नहीं है। जांच दल दान में प्राप्त सोना, चांदी और अन्य कीमती आभूषणों का रिकॉर्ड भी खंगाल रहा है। सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में दानकर्ताओं द्वारा दिए गए आभूषणों की रसीद और अभिलेखों को लेकर भी सवाल उठे हैं।

जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि दान में प्राप्त बहुमूल्य वस्तुओं का उचित लेखा-जोखा रखा गया था या नहीं। इसी कारण ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों और कर्मचारियों से लगातार पूछताछ की जा रही है।

भूमि खरीद विवाद ने बढ़ाई सियासी गर्मी

दान प्रकरण के बीच भूमि खरीद को लेकर भी नया विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने आरोप लगाया है कि राम मंदिर परिसर के आसपास कुछ जमीनें बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदी गईं।

उन्होंने दावा किया कि नवंबर 2023 में खरीदी गई एक भूमि की वास्तविक कीमत और भुगतान की गई राशि में भारी अंतर है। साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किसानों को भूमि अधिग्रहण के दौरान कम मुआवजा दिया गया, जबकि ट्रस्ट ने दूसरी जमीनों के लिए कहीं अधिक कीमत चुकाई।

संजय सिंह ने पूरे प्रकरण की सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में जांच कराने की मांग की है। हालांकि उनके आरोपों पर ट्रस्ट की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है।

विहिप ने भी पारदर्शी जांच का समर्थन किया

विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक में भी यह मुद्दा उठा। परिषद के पदाधिकारियों ने कहा कि भगवान राम के नाम पर प्राप्त दान की एक-एक पाई का हिसाब स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री योगी ने दिया भरोसा

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या दौरे के दौरान कहा कि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और सत्य को सामने आने दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर ट्रस्ट की सिफारिश पर ही एसआईटी का गठन किया गया है और जांच निष्पक्ष ढंग से आगे बढ़ रही है।

मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि जांच पूरी होने तक अनावश्यक बयानबाजी से बचें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या संस्था की छवि धूमिल करने का प्रयास नहीं होना चाहिए।

अयोध्या दौरे में दिखे बदले संकेत

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को रामलला के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। इस दौरान एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। सामान्यतः मुख्यमंत्री के मंदिर आगमन पर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अन्य प्रमुख पदाधिकारी व्यवस्थाओं में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन इस बार पूजा-अर्चना की व्यवस्था ट्रस्ट सदस्य महंत दिनेंद्र दास ने संभाली।

राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को लेकर विभिन्न तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे सामान्य प्रोटोकॉल व्यवस्था का हिस्सा बताया है।

अब एसआईटी रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

दान राशि, सोना-चांदी, सीसीटीवी रिकॉर्ड, बैंकिंग व्यवस्था और भूमि खरीद से जुड़े आरोपों के कारण यह मामला अब बहुआयामी जांच का विषय बन चुका है। एसआईटी लगातार साक्ष्य जुटाने और संबंधित लोगों से पूछताछ करने में जुटी है।

फिलहाल पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। श्रद्धालुओं, संत समाज और राजनीतिक दलों की निगाहें अब एसआईटी की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि कथित अनियमितताओं के पीछे कौन जिम्मेदार है और किसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

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