प्रदेश में रिकॉर्ड बिजली मांग की आहट, व्यवस्था मजबूत करने की उठी मांग संविदा कर्मियों की बहाली, ट्रांसमिशन क्षमता विस्तार और संसाधनों की उपलब्धता पर जोर

लखनऊ, 18 जून 2026 (यूएनएस)। उत्तर प्रदेश में बढ़ती बिजली खपत के बीच आगामी महीनों में रिकॉर्ड विद्युत मांग की संभावना जताई गई है। ऐसे में बिजली व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सरकार और पावर कॉरपोरेशन से समय रहते जरूरी कदम उठाने की मांग की है। परिषद का कहना है कि संविदा कर्मियों की बहाली, पर्याप्त तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता और विद्युत अवसंरचना के विस्तार के बिना बढ़ती मांग का सामना करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) की लोड जनरेशन बैलेंस रिपोर्ट 2026-27 के अनुसार उत्तर प्रदेश में इस वर्ष पीक बिजली मांग 33,033 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। इस आंकड़े के साथ उत्तर प्रदेश देश में सर्वाधिक बिजली मांग वाले राज्यों में दूसरे स्थान पर पहुंच सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र की अनुमानित पीक मांग 36,858 मेगावाट है, जबकि गुजरात 29,375 मेगावाट, मध्य प्रदेश 22,563 मेगावाट और तमिलनाडु 22,488 मेगावाट के साथ क्रमशः तीसरे, चौथे और पांचवें स्थान पर हैं।

परिषद ने दावा किया कि मई माह में ही प्रदेश की बिजली मांग 31,824 मेगावाट तक पहुंच चुकी थी। यदि उस दौरान हुए ब्रेकडाउन और आपूर्ति बाधाओं को भी जोड़ा जाए तो वास्तविक मांग 33 हजार मेगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी थी। परिषद का कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में लागू रोस्टर व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी जाए तो उत्तर प्रदेश की वास्तविक बिजली मांग महाराष्ट्र से भी अधिक हो सकती है।

उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष एवं केंद्रीय सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि प्रदेश में बिजली संकट की आशंका को लेकर परिषद लगातार चेतावनी देती रही है। उनका कहना है कि वर्तमान विद्युत ढांचा उपभोक्ताओं द्वारा लिए गए संयोजित भार के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है। प्रदेश में लगभग 3 करोड़ 73 लाख उपभोक्ताओं का कुल संयोजित भार 8 करोड़ 57 लाख किलोवाट से अधिक है, जबकि 132 केवी सब-स्टेशनों की कुल क्षमता लगभग 6 करोड़ 25 लाख 76 हजार किलोवाट के आसपास है। इस प्रकार करीब 2 करोड़ किलोवाट से अधिक का अंतर विद्युत व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर रहा है।

उन्होंने कहा कि पीक आवर्स के दौरान यदि उपभोक्ताओं की मांग एक साथ बढ़ती है तो ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में निर्बाध बिजली आपूर्ति बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। परिषद ने आशंका जताई कि जुलाई से सितंबर के बीच मानसून और उमस के मौसम में बिजली की मांग और बढ़ सकती है।

परिषद ने पावर कॉरपोरेशन से अपील की है कि सेवा से बाहर किए गए संविदा कर्मियों को दोबारा नियुक्त किया जाए, ताकि फील्ड स्तर पर लाइन मरम्मत, फॉल्ट सुधार और आपूर्ति बहाली के कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न आए। परिषद का मानना है कि बढ़ती मांग के समय प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता बिजली व्यवस्था की मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इसके साथ ही परिषद ने नए सब-स्टेशनों की स्थापना, ट्रांसमिशन क्षमता बढ़ाने, ग्रिड नेटवर्क के विस्तार और वितरण प्रणाली के आधुनिकीकरण के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करने की मांग की है। परिषद का कहना है कि प्रदेश में औद्योगिक गतिविधियों, शहरीकरण और घरेलू उपभोग में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसके अनुरूप विद्युत अवसंरचना का विस्तार भी जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते आवश्यक निवेश और तकनीकी सुधार किए जाते हैं तो उत्तर प्रदेश न केवल बढ़ती बिजली मांग को पूरा कर सकेगा, बल्कि उद्योगों, कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं को भी बेहतर और निर्बाध बिजली आपूर्ति उपलब्ध करा सकेगा। वहीं परिषद ने सरकार से मांग की है कि संभावित संकट से बचने के लिए अभी से व्यापक तैयारी शुरू की जाए, ताकि आने वाले महीनों में प्रदेश को किसी बड़े बिजली संकट का सामना न करना पड़े।

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