बेंगलुरु, 28 मई 2026 (यूएनएस)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने संभावित इस्तीफे की चर्चाओं के बीच राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट को आधिकारिक मंजूरी देकर बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। यह रिपोर्ट राज्य में जातिगत जनगणना से जुड़ी है और इसे कर्नाटक की राजनीति में सामाजिक न्याय की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार इसे सिद्धारमैया की “अहिंदा” राजनीति को मजबूत करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
बुधवार को कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने मुख्यमंत्री को यह रिपोर्ट सौंपी। लंबे समय से लंबित इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए सिद्धारमैया ने कहा कि जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तभी उन्होंने इस सर्वे का आदेश दिया था और अब इसे स्वीकार करते हुए उन्हें संतोष हो रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह रिपोर्ट भविष्य में सामाजिक न्याय लागू करने में मार्गदर्शक साबित होगी।
कर्नाटक की राजनीति में “अहिंदा” यानी अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदाय सिद्धारमैया की राजनीति का मुख्य आधार रहे हैं। ऐसे में इस रिपोर्ट को मंजूरी देकर उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया है कि सामाजिक न्याय का एजेंडा उनकी राजनीति का केंद्र बना रहेगा। माना जा रहा है कि नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच यह फैसला उनके समर्थक वर्ग को मजबूत संदेश देने के उद्देश्य से लिया गया है।
इस जातिगत सर्वे का सफर काफी विवादों से भरा रहा है। सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल के दौरान इसकी शुरुआत हुई थी, लेकिन सरकारों के बदलने और विभिन्न समुदायों के विरोध के कारण यह लागू नहीं हो सका। इससे पहले प्रस्तुत रिपोर्ट पर वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के नेताओं ने तीखी आपत्ति जताई थी और आंकड़ों को पुराना व अवैज्ञानिक बताया था। इसके बाद सरकार ने मधुसूदन नायक आयोग का गठन कर नए सिरे से सर्वे कराया।
अब इस रिपोर्ट को मंत्रिपरिषद की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। इसके आधार पर आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कई बड़े नीतिगत फैसले लिए जा सकते हैं। यदि रिपोर्ट लागू होती है तो राज्य में आरक्षण और जनसंख्या अनुपात को लेकर नई बहस शुरू होने की संभावना है। वहीं, प्रभावशाली समुदायों के विरोध की भी आशंका जताई जा रही है। दूसरी ओर यदि रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ाया गया तो पिछड़ा वर्ग संगठनों और अहिंदा समर्थकों में नाराजगी बढ़ सकती है।
विपक्षी दलों ने इस फैसले को राजनीतिक कदम बताते हुए कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का आरोप है कि जातिगत जनगणना का मुद्दा सरकार ने आंतरिक सत्ता संघर्ष और प्रशासनिक चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए उठाया है। भाजपा नेताओं ने इसे जातीय राजनीति को बढ़ावा देने वाला कदम बताया है।
कर्नाटक का यह फैसला राष्ट्रीय राजनीति में भी असर डाल सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार देशभर में जातीय जनगणना की मांग उठाते रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि यदि कर्नाटक मॉडल आगे बढ़ता है तो अन्य राज्यों में भी सामाजिक-आर्थिक सर्वे और आरक्षण समीक्षा की मांग तेज हो सकती है।
