सूचना का अधिकार : नियंत्रित पारदर्शिता की ओर बढ़ता भारत

अरुण कुमार डनायक….

केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा रूस से भारत के कच्चे तेल आयात संबंधी विस्तृत जानकारी को सार्वजनिक करने से इनकार को 27 अप्रैल 2026 के हालिया फैसले में बरकरार रखा गया, जो एक बार फिर यह प्रश्न उठाता है कि पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन कहां स्थापित किया जाए। आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(डी)- जो वाणिज्यिक गोपनीयता, व्यापार रहस्य या बौद्धिक संपदा से जुड़ी ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक करने से छूट देती है जिनसे किसी तृतीय पक्ष की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है- और धारा 8(1)(ई)कृजो विश्वासगत संबंध में प्राप्त सूचनाओं के प्रकटीकरण से छूट प्रदान करती है- का हवाला देते हुए कहा कि कंपनी-वार आयात डेटा में मूल्य निर्धारण, अनुबंध, छूट और व्यापारिक रणनीतियों जैसी संवेदनशील जानकारियां शामिल होती हैं, जिन्हें सरकार विश्वासगत आधार पर प्राप्त करती है, अत: इनके प्रकटीकरण को छूट के दायरे में रखा जाना उचित है।

इस प्रकार आयोग ने पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें जून 2022 से जून 2025 के बीच रूस से आयातित कच्चे तेल का कंपनी वार और विस्तृत देश वार विवरण देने से मना किया गया था। पीपीएसी, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय का एक प्रमुख तकनीकी विश्लेषणात्मक विंग है, जो डेटा संग्रह, विश्लेषण और नीति समर्थन के माध्यम से देश की ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोलियम अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। यह फैसला सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

आवेदक ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों, रिलायंस और नायरा एनर्जी के लिए अलग-अलग आंकड़े मांगे थे । हालांकि आयोग ने अपील खारिज कर दी, लेकिन साथ ही पीपीएसी को आरटीआई अधिनियम की धारा 4 और 25(5) के तहत स्वप्रेरित पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश भी दिए। यह रुख आयोग के उस प्रयास को दर्शाता है, जिसमें वह गोपनीयता और सार्वजनिक सूचना के बीच संतुलन साधना चाहता है। फिर भी, विस्तृत आयात डेटा को छूट देते हुए पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश देना कुछ हद तक विरोधाभासी प्रतीत होता है।

यह निर्णय ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती रूसी तेल आयात बढ़ाया और 2024-25 में रूस उसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया; वैश्विक प्रतिबंधों, मध्य पूर्व तनाव और अमेरिका के दबाव रियायत के बीच भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करता रहा है। सरकार का तर्क है कि कई देशों में संवेदनशील व्यापारिक डेटा को गोपनीय रखना सामान्य प्रथा है। ऊर्जा आयात अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भू राजनीतिक विषय है; इसलिए यह जानकारी सार्वजनिक करने से कंपनियों की सौदेबाजी क्षमता कमजोर हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं।

गोपनीयता के ऐसे फैसलों से यह प्रश्न भी उठता है कि कहीं सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव-विशेषकर अमेरिका की संभावित नाराजगीकृसे बचने के लिए सूचनाओं के प्रकटीकरण में अतिरिक्त सावधानी तो नहीं बरत रही। यह प्रवृत्ति नई नहीं है; रक्षा, ऊर्जा और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में डेटा साझा करने में सावधानी बरतना लंबे समय से राज्य की नीति रही है, क्योंकि इन क्षेत्रों में सूचना को शक्ति माना जाता है। सरकार के तर्कों के बावजूद पारदर्शिता की कुछ गुंजाइश फिर भी है। तेल बाजार अत्यंत अपारदर्शी है। प्रतिबंधित देश पहचान छिपाने हेतु अक्सर गुप्त जहाजों, ध्वज-परिवर्तन जैसे तरीकों से व्यापार करते हैं । ऐसे में यदि कंपनी या देश-वार डेटा सार्वजनिक न हो, तो तेल के वास्तविक स्रोत, कीमत, संभावित अनियमितताओं तथा अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का आकलन कठिन हो जाता है।

सस्ते कच्चे तेल का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं हो पाता है । जिससे बाजार पारदर्शिता और देश की विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत छूट तभी लागू हो सकती है, जब सूचना के खुलासे से वास्तविक और प्रमाणित नुकसान हो तथा सार्वजनिक हित उससे अधिक न हो । सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि सूचना का खुलासा नियम है और गोपनीयता अपवाद । सीआईसी ने अपने निर्णय में ऐसा प्रतीत होता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(2) अलग से परीक्षण नहीं किया है , जो स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि धारा 8(1) के तहत दी गई किसी भी छूट के बावजूद, यदि सूचना के प्रकटीकरण से होने वाला जनहित उसे रोकने से होने वाले संभावित नुकसान से अधिक हो, तो संबंधित प्राधिकरण को वह सूचना उपलब्ध करानी चाहिए। तेल आयात का डेटा स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित से जुड़ा है, क्योंकि यह ऊर्जा सुरक्षा, मूल्य पारदर्शिता, सस्ते कच्चे तेल का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने और नीति की प्रभावशीलता से सीधे संबंधित है।

कंपनी वार जानकारी न होने से यह आकलन कठिन हो जाता है कि आयात का लाभ पूरी तरह उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है या कुछ सौदे महंगे पड़ रहे हैं, जिससे नीति मूल्यांकन सीमित होता है और जवाबदेही कमजोर पड़ती है। यह नियंत्रित पारदर्शिता का मॉडल है, जिसमें आंकड़ों की झलक तो मिलती है, लेकिन असली तस्वीर सूक्ष्म गोपनीयता के पर्दे के पीछे ही रहती सीआईसी का यह रुख संकेत देता है कि हाल के वर्षों में वह पारदर्शिता की तुलना में संवेदनशील सूचनाओं पर अधिक सतर्क और प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण अपना रहा है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों की ओट में सूचना को सीमित रखने की प्रवृत्ति है, जिससे रक्षा सौदों सहित कई संवेदनशील क्षेत्रों में जानकारी रोकी गई है, और इससे पारदर्शिता घटने के साथ-साथ संभावित अनियमितताओं या भ्रष्टाचार की प्रभावी जांच और पहचान की क्षमता भी सीमित होती है, जिससे सूचना के अधिकार की मूल भावनाकृखुलासा नियम और छूट अपवाद-कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ता है।

आधुनिक ऊर्जा और भू-राजनीतिक परिदृश्य में पूर्ण अपारदर्शिता न तो संभव है और न ही वांछनीय, लेकिन जब गोपनीयता का दायरा लगातार विस्तृत होता जाए और पारदर्शिता अपवाद बन जाए, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का मूल आधार है, और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि गोपनीयता सार्वजनिक हित तथा नागरिकों के सूचना अधिकार को पीछे न धकेल दे। भविष्य में ऐसे मामलों में बेहतर संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता दोनों सुरक्षित रह सकें। इसके लिए आवश्यक है कि पीपीएसी जैसी संस्थाएं वार्षिक स्तर पर विस्तृत ग्रेनुलर डेटा और त्रैमासिक स्तर पर देश-वार आयात आंकड़े नियमित रूप से प्रकाशित करें, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़े, विशेषज्ञ विश्लेषण संभव हो और सार्वजनिक हित प्रभावी रूप से सुरक्षित रह सके।
(लेखक एवं समाजसेवी)

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