वाराणसी। गंगा सप्तमी के पावन अवसर पर वाराणसी में भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। दशाश्वमेध घाट पर मां गंगा का 51 लीटर दूध से भव्य अभिषेक किया गया, जबकि बटुकों और आचार्यों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजन-अर्चन संपन्न कराया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाने वाली गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या कर मां गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराया था। भगवान ब्रह्मा के वरदान और भगवान शिव की जटाओं में धारण करने के बाद गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।
इस अवसर पर ललिता घाट स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में भी भव्य धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किया गया। मंदिर न्यास के तत्वावधान में विद्वान आचार्यों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में शास्त्रोक्त विधि से पूजन, अभिषेक और आरती की गई। गंगाजल, दूध, पुष्प और विभिन्न पूजन सामग्रियों से मां गंगा की आराधना की गई, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
अभिषेक के बाद मां गंगा के विग्रह की विधिवत आरती उतारी गई और श्रद्धालुओं ने विश्वकल्याण व सुख-समृद्धि की कामना की। गंगा उत्पत्ति दिवस के उपलक्ष्य में घाटों पर भव्य गंगा आरती का आयोजन भी हुआ।
इस दौरान स्वच्छता को लेकर विशेष जागरूकता अभियान भी चलाया गया। “रग-रग में गंगा, तब क्यों करें इसे गंदा” जैसे नारों के साथ गंगा को स्वच्छ रखने का संदेश दिया गया। नमामि गंगे अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं ने लोगों को गंगा स्वच्छता की शपथ दिलाई।
नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक राजेश शुक्ला ने कहा कि गंगा केवल आस्था ही नहीं, बल्कि आजीविका का भी आधार है। उन्होंने सभी से अपील की कि गंगा को स्वच्छ रखने में अपना योगदान दें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें।
कार्यक्रम में अन्नपूर्णा सामाजिक सेवा समिति सहित कई सामाजिक संगठनों और श्रद्धालुओं की सक्रिय भागीदारी रही। पूरे आयोजन में भक्ति, परंपरा और स्वच्छता का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
