कानून बनाने का पूर्ण अधिकार संसद को, सरकार के शपथपत्र से बाध्य नहीं: उच्चतम न्यायालय

नई दिल्ली, 27 फरवरी । उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि संसद को कानून बनाने का पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त है और वह केंद्र सरकार द्वारा अदालत में दिए गए किसी भी शपथपत्र से बाध्य नहीं होती। यह टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।

धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह प्रावधान पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता धारा 124ए (राजद्रोह) का पुनर्प्रस्तुतीकरण है। वकीलों ने यह भी कहा कि वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने राजद्रोह कानून की समीक्षा का आश्वासन देते हुए अदालत में शपथपत्र दाखिल किया था, इसलिए बीएनएस में समान प्रावधान शामिल करना उचित नहीं है।

इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका द्वारा अदालत में दिया गया शपथपत्र संसद की विधायी शक्ति को सीमित नहीं कर सकता। न्यायालय ने कहा कि कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और वह स्वतंत्र रूप से विधायी निर्णय ले सकती है।

सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता धारा 173 का मुद्दा भी उठाया और कहा कि यह प्राथमिकी दर्ज करने से संबंधित ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का उल्लंघन करती है। उनका तर्क था कि धारा 173 पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनुमति देती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञेय अपराध की सूचना पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य बताया था।

पीठ ने इस पर कहा कि संबंधित फैसले की अक्सर गलत व्याख्या की जाती है और उसमें भी कुछ परिस्थितियों में प्रारंभिक जांच की अनुमति दी गई है। न्यायालय ने मामले की आगे की सुनवाई होली अवकाश के बाद निर्धारित की है।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष भी उच्चतम न्यायालय ने बीएनएस की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।

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