कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाना सपा की ‘विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी’ : मायावती

लखनऊ, 26 फरवरी। मायावती ने समाजवादी पार्टी द्वारा कांशीराम की जयंती को ‘पीडीए दिवस’ के रूप में मनाने के निर्णय को “विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी” करार देते हुए इसे वोट बैंक की राजनीति बताया है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख ने कहा कि यह कदम दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की वास्तविक चिंता नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ का प्रदर्शन है।

मायावती ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी बयान में आरोप लगाया कि सपा का “चाल, चरित्र और चेहरा” ऐतिहासिक रूप से बहुजन समाज और उसके महापुरुषों के प्रति सम्मानजनक नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि सपा द्वारा कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाना इन वर्गों को आकर्षित करने का प्रयास मात्र है, जिसका उद्देश्य आगामी चुनावों में राजनीतिक लाभ हासिल करना है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने सपा सरकार के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए वर्ष 1995 के चर्चित गेस्ट हाउस कांड का संदर्भ दिया और इसे दलित सम्मान के विरुद्ध गंभीर घटना बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकारों ने बसपा शासनकाल में बनाए गए जिलों और संस्थानों के नाम भी बदले, जो बहुजन समाज के सम्मान के खिलाफ कदम थे।

मायावती ने कहा कि बसपा सरकार ने कासगंज जिले का नाम कांशीराम नगर रखा था, जिसे बाद में बदला गया। इसी तरह संत रविदास नगर, उर्दू-फारसी अरबी विश्वविद्यालय और सहारनपुर के अस्पताल के नाम परिवर्तन को भी उन्होंने बहुजन विरोधी मानसिकता का उदाहरण बताया। उन्होंने दावा किया कि सपा शासनकाल में साम्प्रदायिक दंगों की घटनाएं भी हुईं, जिनसे समाज के विभिन्न वर्ग प्रभावित हुए।

बसपा प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सपा और भाजपा की राजनीति एक-दूसरे को लाभ पहुंचाती रही है। उनके अनुसार, सपा के भड़काऊ राजनीतिक रुख से भाजपा को राजनीतिक फायदा मिलता रहा है, जिससे जातीय और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा।

मायावती के इस बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सपा-बसपा के बीच वैचारिक टकराव को प्रमुख मुद्दा बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बहुजन राजनीति की विरासत और सामाजिक समीकरणों को लेकर यह बहस आगामी चुनावी माहौल में और तेज हो सकती है।

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