चुनाव आयोग के खोखले दावे और एस.आई.आर. प्रक्रिया की गलतियां

पी. चिदम्बरम….

एक वकील के तौर पर मैं समझता हूं कि जब दो सम्मानित न्यायाधीश अदालत की ओर से बोलते हैं, तो वस्तुतः भारत का सर्वोच्च न्यायालय बोल रहा होता है। सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक अदालत है और देश की सर्वोच्च अपीलीय अदालत भी। कुछ मामलों में इसे प्रत्यक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। यह सभी अधीनस्थ अदालतों की निगरानी करता है, अपने फैसलों की समीक्षा कर सकता है, उन्हें संशोधित कर सकता है और स्वतः संज्ञान लेकर मामलों की सुनवाई भी कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पास विशेष जांच दल (एसआईटी) या आयोग गठित करने, जांच एजेंसियों को निर्देश देने, विवादों को मध्यस्थता या पंचाट के लिए भेजने तथा मामलों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की शक्ति भी है। संविधान की इसकी व्याख्या अंतिम मानी जाती है और अनुच्छेद 142 के तहत इसे “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश पारित करने का अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि इसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालतों में से एक माना जाता है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। ‘स्टेट ऑफ मद्रास बनाम वी.जी. रो’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं को संविधान का “सतर्क प्रहरी” (Sentinel on the Qui Vive) बताया था।

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए मतदाता सूची तैयार करने तथा चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं अनुच्छेद 326 लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को वयस्क मताधिकार के आधार पर संचालित करने का प्रावधान करता है।

इन दोनों अनुच्छेदों में कोई टकराव नहीं है। निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है कि वह सभी पात्र वयस्क नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करे। नागरिकता अधिनियम, 1955 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अंतर्गत नागरिकता और निवास जैसी योग्यताएं भी निर्धारित की गई हैं। किसी व्यक्ति की पात्रता का निर्धारण एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

वयस्क मताधिकार का मूल सिद्धांत समावेशिता है। किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाना एक अपवादात्मक कार्रवाई है, जिसके लिए विधिसम्मत प्रक्रिया, लिखित आदेश और न्यायिक समीक्षा की संभावना आवश्यक है।

‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग’ मामले में 27 मई, 2026 को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2003 की मतदाता सूची को पात्रता का प्रमाण माना जाएगा, जब तक कि उसे गलत सिद्ध न कर दिया जाए। जिन व्यक्तियों का नाम उस सूची में नहीं है, उन्हें अपनी पात्रता साबित करने के लिए निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंद्रजीत बरुआ’ (1985) और ‘लाल बाबू हुसैन’ (1995) मामलों में भी माना था कि मतदाता सूची में दर्ज नाम नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच के दौरान किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह हो, तो निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को कारण बताओ नोटिस जारी करना चाहिए, प्रस्तावित कार्रवाई के आधार स्पष्ट करने चाहिए और तर्कपूर्ण आदेश पारित करना चाहिए। ऐसे आदेशों के विरुद्ध जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अपील का प्रावधान भी उपलब्ध है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची तैयार करने या संशोधित करने की प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग को नागरिकता संबंधी प्रश्नों की सीमित जांच का अधिकार है, लेकिन पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगी।

फैसले में उल्लेख किया गया कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लगभग 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसका अर्थ है कि राज्य के प्रत्येक 100 वयस्कों में से लगभग छह लोगों के नाम अंतिम सूची से बाहर हो गए।

फैसले से पहले पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर प्रक्रिया पूरी की जा चुकी थी। वहां लाखों नाम हटाए गए, जिनकी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर न्यायिक समीक्षा कराई गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

  • मृत्यु, डुप्लीकेट प्रविष्टि, स्थानांतरण और अनुपस्थिति के आधार पर हटाए गए नाम: 63.66 लाख
  • ‘तार्किक विसंगतियों’ के आधार पर समरी रिव्यू के बाद हटाए गए नाम: 27.16 लाख
  • कुल हटाए गए नाम: 90.83 लाख
  • न्यायिक अधिकारियों के समक्ष दायर अपीलें: लगभग 25 लाख
  • 14 मई 2026 तक निपटाई गई अपीलें: 6,581
  • स्वीकार की गई अपीलें और पुनः जोड़े गए नाम: 4,043
  • सफलता दर: 61.43 प्रतिशत

पश्चिम बंगाल एकमात्र राज्य था जहां हटाए गए नामों की न्यायिक समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर की गई। बिहार में ऐसा नहीं हुआ।

यदि पश्चिम बंगाल में अपीलों की सफलता दर (61.43 प्रतिशत) को बिहार में हटाए गए 47 लाख नामों पर लागू किया जाए, तो अनुमानतः 28,87,210 लोग ऐसे हो सकते थे जो पुनः मतदाता सूची में शामिल किए जाने के पात्र होते।

मेरे विचार में यह तथ्य निर्वाचन आयोग के दावों की सीमाओं और एसआईआर प्रक्रिया में मौजूद संभावित त्रुटियों, अविश्वसनीयता तथा पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है। प्रश्न यह है कि यदि ऐसी प्रक्रियाओं पर पर्याप्त निगरानी और समीक्षा न हो, तो क्या लोकतंत्र की मूल भावना सुरक्षित रह पाएगी?

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *