अस्थिर विश्व में भारत,अर्थनीति, कूटनीति और छवि का पुनर्पाठ

अरुण डनायक….
वैश्विक परिदृश्य में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी के अंत में भड़के युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को गहरे अस्थिरता के दौर में धकेल दिया, जिससे भारत भी अप्रभावित नहीं रहा। यद्यपि सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने सरकार को सहयोग का आश्वासन दिया और ईरान से संवाद स्थापित कर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही सुनिश्चित करने में आंशिक सफलता मिली, जिससे ऊर्जा संकट को काफी हद तक टाला जा सका, फिर भी महंगाई, बेरोजगारी और शेयर बाजार में आई तीव्र गिरावट ने आम नागरिकों को आर्थिक रूप से प्रभावित किया, जिसकी भरपाई में समय लगेगा। इसी कालखंड में कुछ वैश्विक घटनाएं भारत के लिए मिश्रित संकेत लेकर आईं, जो यह दर्शाती हैं कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति, आर्थिक सुदृढ़ता और वैश्विक भूमिकाकृतीनों पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का आरंभ एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

इस संदर्भ में विदेश मंत्री की तात्कालिक प्रतिक्रिया बौद्धिक वर्ग में व्यापक स्वीकृति नहीं पा सकी। विदेश मंत्री जैसे राजनीतिक पद से स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील और व्यापक दृष्टिकोण की अपेक्षा होती है। ऐसे में उनका हालिया वक्तव्य अधिक उपयुक्त किसी पेशेवर राजनयिक के मुख से प्रतीत होता हैकृशायद यही कारण है कि पूर्व विदेश सचिव की उनकी प्रशासनिक दृष्टि अब भी उनके कथनों में झलकती है, जबकि मंत्री पद उससे कहीं अधिक राजनीतिक सूझबूझ की मांग करता है। यह स्थिति कहीं न कहीं भारत की कूटनीतिक सीमाओं को भी उजागर करती है, क्योंकि प्रधानमंत्री की विभिन्न वैश्विक नेताओं से निकटता के बावजूद भारत इस शांति पहल में निर्णायक भूमिका हेतु आवश्यक विश्वास और प्रभाव अर्जित नहीं कर सका।

पिछले एक दशक में जब-जब विश्व में संघर्ष और अशांति बढ़ी, प्रधानमंत्री द्वारा श्यह युद्ध का युग नहीं हैश् की बात तो बार-बार कही गई, किंतु उसके अनुरूप कोई ठोस शांति-योजना सामने नहीं आई। संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम प्रस्तावों पर मतदान से दूरी बनाकर भारत ने तटस्थता का संकेत देने का प्रयास किया, परंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय के एक हिस्से ने इसे निष्पक्षता के बजाय अनिर्णय के रूप में देखा। परिणामस्वरूप, जहां नेहरू युग में भारत कोरियाई और वियतनामी संकटों में मध्यस्थता के लिए जाना जाता था, वहीं आज उसकी वह भूमिका अपेक्षाकृत सीमित हो गई है। टाइम पत्रिका की 100 सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में रणबीर कपूर (अभिनेता), सुंदर पिचाई (सीईओ गूगल) और विकास खन्ना (पाककला) जैसे भारतीयों का शामिल होना निस्संदेह गौरव का विषय हैय किंतु पांच बार इस सूची में स्थान पा चुके प्रधानमंत्री मोदी का इस बार अनुपस्थित रहना विशेष रूप से तब ध्यान आकर्षित करता है, जब नेपाल और बांग्लादेश के अपेक्षाकृत नए नेतृत्व को इसमें स्थान मिला है।

यह स्थिति भारत की उस उभरती वैश्विक छवि पर स्वाभाविक प्रश्न उठाती है, जिसे घरेलू विमर्श में बार-बार रेखांकित किया जाता रहा है, और अंतरराष्ट्रीय मान्यता व घरेलू दावों के बीच उभरती दूरी की ओर संकेत करती है।
इसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का स्थान चौथे से छठे पर खिसकना ध्यान आकर्षित करता है। इस उतार-चढ़ाव को समझने के लिए दो प्रमुख कारककृजीडीपी के आधार वर्ष में परिवर्तन और रुपये पर बढ़ता दबावकृमहत्वपूर्ण हैं। जीडीपी का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना भले ही एक तकनीकी सुधार हो, किंतु इससे अर्थव्यवस्था का आकार अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देने लगा, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक स्थिति की धारणा प्रभावित हुई। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुधार की पृष्ठभूमि और पूर्व में आंकड़ों की विश्वसनीयता पर उठते प्रश्नों ने सांख्यिकीय साख पर भी अनावश्यक प्रश्नचिह्न खड़े किए।

दूसरी ओर, उच्च तेल कीमतों, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक तनावों से रुपये पर बने दबाव ने डॉलर में मापी जाने वाली जीडीपी को सीमित किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय रैंकिं ग में गिरावट का आभास हुआ, जबकि घरेलू वृद्धि सुदृढ़ बनी रही। यह स्थिति मुख्यतरू विनिमय दर और सांख्यिकीय कारणों का परिणाम है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक को अधिक सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए था। यद्यपि उसने समय-समय पर बाजार में सीमित हस्तक्षेप कर अल्पकालिक दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित किया, किंतु यह हस्तक्षेप रुपये की निरंतर गिरावट को रोक कर उसे अपेक्षित स्थिरता प्रदान करने में पूर्णतरू सफल नहीं हो सका। परिणामस्वरूप, नीति का प्रभाव संतुलनकारी तो रहा, पर निर्णायक नहीं बन सका।

इटली सहित यूरोप के कई देशों में सरकार और जनता के स्तर पर इजरायल के प्रति रुख में आया बदलाव यह संकेत देता है कि वैश्विक राजनीति में अब अंध-समर्थन के बजाय मानवीय और नैतिक प्रश्न अधिक प्रभावी हो रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत की पश्चिम एशिया नीति, जो औपचारिक रूप से संतुलन पर आधारित कही जाती है, व्यवहार में कई बार अस्पष्ट और अवसरवादी प्रतीत होती है। एक ओर इजरायल के साथ बढ़ता रणनीतिक सहयोग है, तो दूसरी ओर अरब देशों के साथ ऊर्जा और प्रवासी हितों की अनिवार्यताकृपरंतु इनके बीच अपेक्षित नैतिक स्पष्टता का अभाव दिखता है। घरेलू स्तर पर उभरने वाली सांप्रदायिक घटनाएं मुस्लिम जगत में भारत की छवि को प्रभावित करती हैं, जिससे विश्वास में सूक्ष्म दरारें पड़ती हैं। ईरान द्वारा तेल टैंकरों को अनुमति देने के संदर्भ में श्जनसमर्थन्य का उल्लेख भी संकेत देता है कि वह केवल सरकार नहीं, बल्कि भारतीय समाज और जनमत को भी संबोधित करना चाहता हैकृअर्थात कूटनीति में सामाजिक धारणा की भूमिका बढ़ती जा रही है।

इन परिस्थितियों में भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी पश्चिम एशिया नीति को अधिक स्पष्ट, सुसंगत और नैतिक आधार प्रदान करे, ताकि बढ़ती भू-राजनीतिक जटिलताओं के बीच उसकी रणनीतिक स्थिति विश्वसनीय और संतुलित बनी रहेय अन्यथा श्रणनीतिक स्वायत्तताश् की अवधारणा केवल एक औपचारिक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बनकर रह जायेगी। हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार का प्रभाव कमजोर होना यह संकेत देता है कि लंबे समय तक एक वैचारिक धारा के प्रभुत्व के बाद मतदाता बदलाव की ओर झुकते हैं, विशेषकर जब आर्थिक, लोकतांत्रिक या संस्थागत मुद्दे उभरते हैं। वहीं नेपाल में सत्ता परिवर्तन प्रायरू आंतरिक अस्थिरता और गठबंधन-राजनीति का परिणाम है, जहां विचारधारा से अधिक सत्ता-समीकरण निर्णायक रहते हैं। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि आज के मतदाता केवल वैचारिक अपील नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता, आर्थिक प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय छवि जैसे ठोस पहलुओं पर निर्णय लेते हैं। अंततः, बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के समक्ष चुनौती केवल आर्थिक या कूटनीतिक नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और नैरेटिव के पुनर्संतुलन की भी है, और यही संतुलन उसकी वास्तविक वैश्विक भूमिका को आकार देगा।
(लेखक एवं समाजसेवी)

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