नई दिल्ली। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा दी गई ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है। साथ ही, अदालत ने इस मामले में खेड़ा को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पवन खेड़ा अग्रिम जमानत चाहते हैं, तो उन्हें संबंधित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत, यानी असम की अदालत का रुख करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि फिलहाल उन्हें गिरफ्तारी से कोई अंतरिम संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की। असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि कथित अपराध असम में हुआ है, इसलिए तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत देना अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उन्होंने इसे “फोरम शॉपिंग” और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
असम सरकार ने अपनी याचिका में कहा कि पवन खेड़ा पर लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, जिनमें मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं शामिल हैं। ये मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भूयान सरमा पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़ा है। इस संबंध में असम पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि पवन खेड़ा असम की अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
वहीं, खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि यदि आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तो यह अधिकतम मानहानि का मामला बनता है, जिसमें गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।
दूसरी ओर, असम सरकार के महाधिवक्ता देवजीत सैकिया ने सवाल उठाया कि दिल्ली निवासी होने के बावजूद खेड़ा ने तेलंगाना हाई कोर्ट का रुख क्यों किया, जबकि मामला असम से संबंधित है।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक माहौल को भी गरमा दिया है। कांग्रेस ने इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने खेड़ा के बयान को गैरजिम्मेदार और मानहानिकारक करार दिया है।
