ब्रिस्बेन, 22 फरवरी: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सभी देशों से होने वाले आयात पर वैश्विक शुल्क बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की घोषणा की है। यह निर्णय अमेरिकी उच्चतम न्यायालय के उस हालिया फैसले के बाद लिया गया है, जिसमें आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए व्यापक शुल्कों को अवैध करार दिया गया था।
यह विश्लेषण क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की विशेषज्ञ फेलिसिटी डीन द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसमें ट्रंप प्रशासन के संभावित आर्थिक और कानूनी विकल्पों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने पहले अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम के तहत व्यापक “पारस्परिक शुल्क” लागू किए थे। हालांकि, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह कानून राष्ट्रपति को इस प्रकार के व्यापक व्यापारिक प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं देता। अदालत के निर्णय के बाद ट्रंप ने न्यायाधीशों की आलोचना करते हुए फैसले को निराशाजनक बताया।
नए निर्णय के तहत घोषित 15 प्रतिशत शुल्क उस 10 प्रतिशत वैश्विक दर से अधिक है, जिसे अदालत के फैसले के तुरंत बाद लागू किया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम एक अलग कानूनी प्रावधान के तहत उठाया गया है, जो राष्ट्रपति को सीमित अवधि—अधिकतम 150 दिन—के लिए शुल्क बढ़ाने की अनुमति देता है।
ट्रंप प्रशासन इस अवधि के दौरान 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के उपयोग की भी संभावना तलाश रहा है। यह प्रावधान उन देशों पर शुल्क लगाने की अनुमति देता है जो अमेरिकी व्यापार हितों के विरुद्ध अनुचित या भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाते हैं। इस कानून का उपयोग पहले चीन पर शुल्क लगाने के लिए किया जा चुका है।
एक अन्य विकल्प के रूप में 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 का भी उल्लेख किया गया है, जिसका उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर विशिष्ट उत्पादों पर शुल्क लगाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रावधान सभी आयातों पर व्यापक शुल्क लागू करने के लिए उपयुक्त नहीं है।
नए शुल्क का प्रभाव वैश्विक व्यापार पर पड़ने की संभावना है, विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया जैसे निर्यातक देशों पर। यद्यपि निर्यातक सीधे शुल्क का भुगतान नहीं करते, लेकिन अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। व्हाइट हाउस की घोषणा में बीफ, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा उत्पाद और दवाइयों जैसे कुछ क्षेत्रों को अपवाद के रूप में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि पूर्व में वसूले गए शुल्कों को वापस किया जाता है, तो पुनर्भुगतान की राशि लगभग 175 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकती है। अदालत के फैसले में रिफंड प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं, जिससे अनिश्चितता बनी हुई है।
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। 2018 में इस्पात और एल्युमीनियम पर लगाए गए शुल्कों को कई व्यापारिक साझेदारों ने विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी थी, और नए कदमों से वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
ट्रंप ने कहा है कि इस निर्णय से व्यापारिक नीति में “निश्चितता” लौटेगी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अनिश्चितता अभी समाप्त नहीं हुई है और आने वाले महीनों में इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
