लखनऊ, 17 फरवरी। उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि प्रदेश की सभी शैक्षणिक संस्थाएं निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक नियमों के आधार पर संचालित होती हैं। उन्होंने कहा कि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की सेवा शर्तें अलग-अलग नियमों से नियंत्रित होती हैं, इसलिए दोनों के बीच सुविधाओं की सीधी तुलना करना उचित नहीं है।
सदन में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए मंत्री ने बताया कि राजकीय महाविद्यालयों के शिक्षक राज्य सरकारी सेवकों की श्रेणी में आते हैं। उनकी नियुक्ति और सेवा शर्तें संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत अधिसूचित नियमावलियों से विनियमित होती हैं। इसके विपरीत राज्य विश्वविद्यालयों तथा उनसे संबद्ध महाविद्यालयों के कर्मचारी उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 और उससे संबंधित परिनियमों के अंतर्गत कार्य करते हैं, जिसके कारण दोनों व्यवस्थाओं में स्वाभाविक अंतर है।
मंत्री उपाध्याय ने उदाहरण देते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष निर्धारित है, जबकि राजकीय महाविद्यालयों में यह 60 वर्ष है। इसी प्रकार अवकाश सुविधाओं में भी भिन्नता है। विश्वविद्यालय शिक्षकों को यूजीसी मानकों के अनुरूप अर्जित अवकाश, विशेष आकस्मिक अवकाश और अर्ध वेतन अवकाश जैसी सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जबकि राजकीय महाविद्यालय शिक्षकों के लिए अलग अवकाश व्यवस्था लागू है, जिसमें चिकित्सकीय अवकाश सहित अन्य प्रावधान शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि सेवा संरचना और नियामक ढांचे में अंतर होने के कारण किसी एक वर्ग को प्राप्त सुविधा को दूसरे वर्ग पर लागू करना व्यावहारिक नहीं है। तुलनात्मक दृष्टिकोण के बजाय नियमों के अनुरूप व्यवस्था बनाए रखना ही न्यायसंगत है।
उच्च शिक्षा मंत्री ने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था को संतुलित, पारदर्शी और नियमसम्मत ढंग से संचालित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए नीतिगत निर्णय लिए जा रहे हैं, ताकि प्रदेश में उच्च शिक्षा प्रणाली प्रभावी और व्यवस्थित रूप से कार्य करती रहे।
