नयी दिल्ली, 12 फरवरी (Agency)। रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लंबे समय से लंबित प्रस्ताव को बृहस्पतिवार को मंजूरी दे दी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने सशस्त्र बलों की युद्धक क्षमता को मजबूत करने के लिए लगभग 3.60 लाख करोड़ रुपये के सैन्य उपकरणों की पूंजीगत खरीद को ‘आवश्यकता स्वीकृति’ (एओएन) प्रदान की।
सूत्रों के अनुसार, इस परियोजना के तहत राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन 18 विमान सीधे ‘उड़ान भरने की स्थिति’ में आपूर्ति करेगी, जबकि शेष विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। इन विमानों के निर्माण में 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशीकरण शामिल होगा और उत्पादन चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा।
हालांकि रक्षा मंत्रालय ने सौदे की सटीक लागत का खुलासा नहीं किया है, लेकिन अनुमान है कि इसकी कीमत 2.90 लाख करोड़ रुपये से 3.15 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकती है। यह मंजूरी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रस्तावित भारत यात्रा से चार दिन पहले दी गई है।
अधिकारियों के अनुसार, अंतिम अनुबंध इस वर्ष के अंत से पहले होने की संभावना नहीं है, क्योंकि हथियार पैकेज की लागत और अन्य तकनीकी विवरणों को अंतिम रूप देने के लिए दसॉल्ट एविएशन के साथ विस्तृत बातचीत की जानी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) से भी अंतिम स्वीकृति आवश्यक होगी।
भारतीय वायुसेना ने अप्रैल 2019 में लगभग 18 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से 114 बहु-उद्देश्यीय लड़ाकू विमान (एमआरएफए) की खरीद के लिए आरएफआई जारी की थी। इस कार्यक्रम को हाल के वर्षों में दुनिया के सबसे बड़े सैन्य खरीद कार्यक्रमों में से एक माना गया। अन्य दावेदारों में लॉकहीड मार्टिन का एफ-21, बोइंग का एफ/ए-18 और यूरोफाइटर टाइफून शामिल थे।
वर्तमान में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रन की संख्या स्वीकृत 42 के मुकाबले घटकर 31 रह गई है। इससे पहले 2015 में केंद्र सरकार ने 36 राफेल विमानों की खरीद का निर्णय लिया था, जिनका संचालन वायुसेना कर रही है।
अन्य रक्षा खरीद को भी मंजूरी
रक्षा मंत्रालय ने बताया कि डीएसी ने भारतीय वायुसेना के लिए एमआरएफए, उन्नत लड़ाकू मिसाइलों और एयरशिप आधारित उच्च ऊंचाई वाले छद्म उपग्रह (एएस-एचएपीएस) की खरीद को भी मंजूरी दी है। मंत्रालय के अनुसार, अधिकांश मिसाइलों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा, जिससे लंबी दूरी की मारक क्षमता और सटीक हमले की क्षमता में वृद्धि होगी।
एएस-एचएपीएस प्रणाली का उपयोग निरंतर खुफिया, निगरानी, टोही, इलेक्ट्रॉनिक खुफिया, दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग के लिए किया जाएगा।
इसके अलावा भारतीय नौसेना को चार मेगावाट के समुद्री गैस टरबाइन आधारित विद्युत जनरेटर और पी-8आई लंबी दूरी के समुद्री टोही विमान के अधिग्रहण की भी मंजूरी दी गई है। मंत्रालय ने कहा कि इससे नौसेना की पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी और समुद्री हमले की ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि होगी तथा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
