गोंडा (उत्तर प्रदेश), 29 जनवरी : पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक का स्वागत किया है। बृहस्पतिवार को गोंडा जिले के परसपुर क्षेत्र में एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे बृजभूषण सिंह ने कहा कि शीर्ष अदालत का यह फैसला समाज के हित में है और इससे अनावश्यक विवादों पर विराम लगेगा।
उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए नियम समाज में भ्रम और कटुता पैदा कर सकते थे। ऐसे में इन नियमों पर रोक लगाकर उच्चतम न्यायालय ने सकारात्मक और संतुलित कदम उठाया है। पूर्व सांसद ने इससे पहले भी इन नियमों को लेकर आपत्ति जताई थी और सरकार से इन्हें वापस लेने की मांग की थी।
उच्चतम न्यायालय के फैसले पर बृजभूषण शरण सिंह के सांसद बेटे करण भूषण सिंह ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए इसे समाज में एकता को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर बताया और न्यायालय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह फैसला सामाजिक सौहार्द बनाए रखने में सहायक सिद्ध होगा।
इस बीच, बृजभूषण शरण सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि वह यूजीसी के नए नियमों पर निर्णय लेने वाली किसी समिति का हिस्सा नहीं थे। सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर हो रही ट्रोलिंग के बाद उन्होंने यह स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से दिया था।
गोंडा सदर से भाजपा विधायक और करण भूषण सिंह के बड़े भाई प्रतीक भूषण सिंह ने भी उच्चतम न्यायालय के फैसले पर खुशी जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यूजीसी के नए नियमों में जाति से जुड़े प्रावधान अस्पष्ट थे और उनका दुरुपयोग होने की आशंका बनी हुई थी। उन्होंने कहा कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर स्पष्ट और सर्वसम्मत नियम बनाए जाने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने यूजीसी के हालिया नियमों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए इन नियमों पर रोक लगा दी। याचिकाओं में दलील दी गई थी कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की एक गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब मांगा है।
उल्लेखनीय है कि यूजीसी ने 13 जनवरी को नए नियम अधिसूचित किए थे, जिनके तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सभी संस्थानों में ‘समानता समितियों’ का गठन अनिवार्य किया गया था। हालांकि, अब इन नियमों पर अगली सुनवाई तक रोक रहेगी।
