नयी दिल्ली, 29 जनवरी । जोधपुर की केंद्रीय जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में उन आरोपों का खंडन किया कि उन्होंने ‘अरब स्प्रिंग’ की तर्ज पर सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कही थी। वांगचुक की ओर से यह भी कहा गया कि उन्हें आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है।
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ के समक्ष दलील दी कि पुलिस ने हिरासत आदेश पारित कराने के लिए चुनिंदा और संदर्भ से काटे गए वीडियो का सहारा लिया, जिससे हिरासत में भेजने वाले प्राधिकारी को गुमराह किया गया।
सिब्बल ने पीठ से कहा, “वीडियो देखिए। पुलिस का दावा है कि वह कह रहे हैं कि अगर भारत सरकार राज्य का दर्जा नहीं देगी तो वह अरब स्प्रिंग की तरह सरकार को उखाड़ फेंकेंगे। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है। मैं वीडियो की लिप्यंतरण (ट्रांसक्रिप्ट) अदालत में प्रस्तुत करूंगा।”
उल्लेखनीय है कि ‘अरब स्प्रिंग’ पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में वर्ष 2010 से 2018 के बीच हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों, विद्रोहों और सशस्त्र बगावतों की एक श्रृंखला को कहा जाता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने उन आरोपों का भी खंडन किया, जिनमें कहा गया था कि वांगचुक ने एक साक्षात्कार में यह टिप्पणी की थी कि यदि सरकार मदद नहीं करेगी तो लद्दाख के लोग युद्ध के दौरान भारतीय सेना की सहायता नहीं करेंगे। सिब्बल ने कहा, “यह पूरी तरह गलत है। यही इस मामले की मूल समस्या है। हिरासत आदेश पारित कराने वाले प्राधिकारियों को गुमराह किया गया है।”
उन्होंने अदालत को बताया कि उनके पास उस वीडियो का लिंक है, जिसमें वांगचुक सरकार और प्रधानमंत्री की प्रशंसा करते हुए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध का स्पष्ट उल्लेख कर रहे हैं।
सिब्बल ने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक के कथित बयान को गलत तरीके से पेश किया गया, जिसमें यह कहा गया था कि उन्होंने कारगिल के कश्मीर में विलय या जनमत संग्रह की बात की है। उन्होंने कहा, “किसी ने उन्हें बताया कि कारगिल कश्मीर में शामिल होना चाहता है। उन्होंने केवल इतना कहा कि अगर वे शामिल होना चाहते हैं तो कर सकते हैं। इसमें जनमत संग्रह से जुड़ी कोई बात नहीं है।”
वरिष्ठ वकील ने वांगचुक पर हिंदू देवी-देवताओं के अपमान से जुड़े आरोपों को भी निराधार बताया और कहा कि एक आईटी सेल द्वारा उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा, “असंपादित वीडियो देखने से पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। वांगचुक यह कहना चाह रहे थे कि कश्मीर से लद्दाख को अलग किए जाने के बाद केंद्र सरकार संविधान की छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा देने के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही।”
सिब्बल ने आगे कहा, “उन्होंने राम के संदर्भ में एक प्रतीकात्मक उदाहरण दिया था—कि जिस तरह राम ने सीता को रावण से मुक्त कराया, उसी तरह केंद्र ने लद्दाख को मुक्त किया, लेकिन बाद में उसे संरक्षण के बिना छोड़ दिया। अगर इस तरह के प्रतीकात्मक बयानों के आधार पर लोगों को हिरासत में लिया जाएगा, तो बेहतर होगा कि हम बोलना ही बंद कर दें। उनकी पत्नी स्वयं एक हिंदू हैं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा कि लद्दाख एक संवेदनशील क्षेत्र है, जहां प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है, और वांगचुक का पूरा आंदोलन इसी उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।
अदालत में इस मामले की सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है और इसे दो फरवरी को आगे सुना जाएगा। गीतांजलि अंगमो ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है।
