इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी: पश्चिमी प्रभाव से बढ़ रहे लिव-इन रिश्ते, बिगड़ने पर दर्ज होती हैं एफआईआर

प्रयागराज, 26 जनवरी । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा है कि पश्चिमी विचारों के प्रभाव में युवाओं के बीच ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ का चलन बढ़ा है और ऐसे संबंध खराब होने पर अक्सर दुष्कर्म के आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती है। अदालत ने इन टिप्पणियों के साथ एक युवक को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र की खंडपीठ ने चंद्रेश नामक युवक की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि मौजूदा सामाजिक परिदृश्य में बिना विवाह के साथ रहने के मामले बढ़े हैं। पीठ ने यह भी कहा कि जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं, तो कई मामलों में आपराधिक मुकदमे दर्ज हो जाते हैं, जबकि संबंधित कानून उस समय बनाए गए थे जब ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ की अवधारणा प्रचलन में नहीं थी।

मामले के अनुसार, एक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसकी बेटी को शादी का झांसा देकर घर से ले गया और बेंगलुरु में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हालांकि, रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद उच्च न्यायालय ने पाया कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी और वह अपनी मर्जी से युवक के साथ गई थी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने ‘ऑसिफिकेशन टेस्ट’ रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया, जिसमें पीड़िता की उम्र करीब 20 वर्ष पाई गई थी।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पीड़िता बेंगलुरु के घनी आबादी वाले क्षेत्र में आरोपी के साथ करीब छह महीने तक रही और दोनों के बीच सहमति से संबंध बने। छह अगस्त 2021 को आरोपी द्वारा शिकारपुर चौराहे पर छोड़े जाने के बाद पीड़िता ने अपने परिवार से संपर्क किया।

इन तथ्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने कहा कि आईपीसी की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि पूरी तरह अवांछित है, क्योंकि पीड़िता बालिग थी और उसने अपनी इच्छा से घर छोड़ा था। अदालत ने इसी आधार पर आरोपी को दी गई सजा रद्द कर दी।

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