नयी दिल्ली, 13 जनवरी– निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि मतदाता सूची और चुनाव संचालन से जुड़े मामलों में वह मूल तथा संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है और यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करता है, तो इस संबंध में आयोग की राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होती है। आयोग ने यह दलील बिहार सहित कई राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के दौरान दी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने विस्तृत तर्क रखते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह से चुनाव आयोग के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर है। उन्होंने इस दावे को खारिज किया कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) जैसी किसी समानांतर नागरिकता-निर्धारण व्यवस्था के समान है।
द्विवेदी ने अदालत को बताया कि एसआईआर के दौरान यदि किसी व्यक्ति के संबंध में प्रतिकूल निष्कर्ष निकलता है, तो उसका परिणाम केवल उस व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति का निर्वासन स्वतः नहीं हो जाता। ऐसे मामलों को आवश्यक होने पर नागरिकता अधिनियम, विदेशी अधिनियम और अन्य संबंधित कानूनों के तहत जांच एवं संभावित कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेजा जा सकता है।
निर्वाचन आयोग ने यह भी कहा कि कई नियामक ढांचों में, जैसे खनन पट्टों या अन्य वैधानिक लाभों से जुड़े मामलों में, नागरिकता एक अनिवार्य शर्त होती है और सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसकी जांच की जा सकती है। इस तर्क के माध्यम से आयोग ने उस आरोप का खंडन किया कि वह अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य कर रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 146, विशेष रूप से धारा 146ए से 146सी का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद ने निर्वाचन आयोग को सुनवाई करने, निर्णय देने और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर दीवानी अदालत जैसी शक्तियां प्रदान की हैं। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग की देखरेख में कार्य करने वाला निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) चुनावी उद्देश्यों के लिए सीमित स्तर पर नागरिकता से संबंधित जांच करने का अधिकार रखता है।
द्विवेदी ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करने का आरोप है या वह वास्तव में विदेशी नागरिकता हासिल कर चुका है, तो चुनावी प्रयोजनों के लिए इस मुद्दे की जांच अंततः निर्वाचन आयोग ही करता है और उसकी राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होती है। आयोग ने दोहराया कि यह जांच केवल मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता तय करने तक सीमित है और इसे नागरिकता निर्धारण की व्यापक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
