यूजीसी नियमों पर आरएसएस नेता सुनील आंबेकर का बयान: संघ समाज में एकता के पक्ष में

मुंबई, तीन फरवरी । उच्चतम न्यायालय द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई समता नियमावली पर रोक लगाए जाने के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने मंगलवार को कहा कि संघ समाज में एकता बनाए रखने के पक्ष में है और इसके लिए जो भी आवश्यक होगा, वह किया जाएगा।

यूजीसी नियमों को लेकर पूछे गए सवाल पर आंबेकर ने कहा कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और विभिन्न लोगों ने इस पर अपने विचार रखे हैं। उन्होंने कहा, “अदालत ने दिशा-निर्देशों पर रोक लगाई है। संघ का मानना है कि समाज में एकता बनी रहनी चाहिए और हम सभी एकता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे।”

स्वतंत्रता संग्राम में आरएसएस की भूमिका पर उठने वाले सवालों का जवाब देते हुए आंबेकर ने कहा कि संघ को सौ साल बाद यह बताने की जरूरत नहीं है कि उसने देश की संप्रभुता और एकता के लिए क्या किया है। उन्होंने कहा, “संघ का गठन भी इसी उद्देश्य से हुआ था। संघ ने जो कुछ भी किया है, वह देश के हित में ही किया है।”

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले महीने यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों की जांच और समानता को बढ़ावा देने के लिए ‘समता समितियों’ के गठन का प्रावधान है। इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग और महिला सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इन नियमों के ढांचे को “प्रथम दृष्टया अस्पष्ट” बताते हुए इन पर रोक लगा दी है और कहा है कि इसके व्यापक परिणाम हो सकते हैं, जो समाज को विभाजित भी कर सकते हैं।

‘शहर को हरे रंग में रंगने’ से जुड़े हालिया विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि देश का रंग हजारों वर्षों से भगवा रहा है। यह टिप्पणी ठाणे में एआईएमआईएम की एक पार्षद के उस बयान के संदर्भ में आई है, जिसमें उन्होंने मुंब्रा को हरे रंग से रंगने की बात कही थी।

भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए आंबेकर ने कहा कि आरएसएस का स्पष्ट रुख है कि सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं। उन्होंने कहा कि देश की परंपरा रही है कि सभी भाषाएं एक साथ फलती-फूलती रही हैं। “अगर लोग भाषा के इतिहास को भूल जाएंगे, तो समस्याएं उत्पन्न होंगी,” उन्होंने कहा।

उल्लेखनीय है कि हाल में संपन्न महानगरपालिका चुनावों में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मराठी भाषा और अस्मिता को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था।

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