मायावती का सरकारों पर तीखा प्रहार: संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ राष्ट्रीय हित के लिए घातक

लखनऊ, 19 अक्टूबर – बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने रविवार को केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों में इस कदर लिप्त हो गई हैं कि इससे न केवल जनता का कल्याण प्रभावित हो रहा है, बल्कि राष्ट्रीय हित भी खतरे में पड़ गया है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति देश के स्वाभाविक विकास में बड़ी बाधा बन चुकी है।

लखनऊ में पार्टी की अखिल भारतीय बैठक को संबोधित करते हुए मायावती ने कहा, “संविधान के जनहित और लोक-कल्याणकारी उद्देश्यों को त्यागकर राजनीतिक स्वार्थों को प्राथमिकता देना खतरनाक स्थिति पैदा कर रहा है। इससे सरकारों की साख और देश की वैश्विक प्रतिष्ठा दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।”

इस बैठक में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़कर अन्य राज्यों के पार्टी पदाधिकारियों ने भाग लिया। मायावती ने संगठन की जमीनी मजबूती और जनाधार बढ़ाने के लिए चल रहे कार्यों की राज्यवार समीक्षा की। उन्होंने साफ किया कि जिन राज्यों में संगठनात्मक कमियां हैं, वहां उन्हें शीघ्र दूर किया जाएगा और राजनीतिक हालात के अनुरूप रणनीति बनाई जाएगी।

बसपा प्रमुख ने हाल ही में लखनऊ में आयोजित ‘मान्यवर श्री कांशीराम जी स्मारक स्थल’ पर उत्तर प्रदेश की राज्य स्तरीय बैठक की सफलता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के गांव-गांव में लोगों ने “सत्ता की चाबी” अपने हाथ में लेने के लिए उत्साह दिखाया है, वैसी ही तैयारी और भावना अन्य राज्यों में भी विकसित करने की जरूरत है।

मायावती ने देश में हाल ही में हुई कुछ घटनाओं पर गहरी चिंता जाहिर की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अदालत कक्ष में हुई ‘अभूतपूर्व और अप्रिय घटना’, हरियाणा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की आत्महत्या और जातिवादी टिप्पणियों जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए इन्हें ‘सभ्य समाज और संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा’ बताया।

उन्होंने सवाल उठाया कि इन घटनाओं पर सरकार और संबंधित संस्थाओं द्वारा वह गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है, जो कानून के शासन में अपेक्षित होती है। मायावती ने मांग की कि ऐसी घटनाओं पर निष्पक्ष और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि संविधान की गरिमा और सामाजिक न्याय की अवधारणा अक्षुण्ण बनी रहे।

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