भ्रष्टाचार मामलों में लोकसेवकों के खिलाफ जांच की पूर्व मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला

नयी दिल्ली, 13 जनवरी – उच्चतम न्यायालय ने लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति लेने से जुड़े भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर मंगलवार को खंडित फैसला सुनाया। न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ में इस प्रावधान को लेकर मतभेद सामने आए, जिसके बाद मामले को अंतिम निर्णय के लिए प्रधान न्यायाधीश के समक्ष भेज दिया गया है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने अपने अलग फैसले में धारा 17ए को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि जांच से पहले पूर्व मंजूरी की शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है। उन्होंने कहा कि इससे जांच प्रक्रिया बाधित होती है और भ्रष्ट लोकसेवकों को बच निकलने का अवसर मिल जाता है। न्यायमूर्ति नागरत्ना के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष और प्रभावी जांच के लिए किसी भी प्रकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

वहीं, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने धारा 17ए को संवैधानिक रूप से वैध मानते हुए कहा कि यह प्रावधान ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मंजूरी देने का अधिकार लोकपाल या राज्य के लोकायुक्त के पास हो, तो यह व्यवस्था भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और ईमानदार प्रशासन को संरक्षण देने में सहायक हो सकती है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि दोनों न्यायाधीशों की भिन्न-भिन्न राय को देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि मामले को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए, ताकि एक बड़ी पीठ का गठन कर इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सके।

यह फैसला गैर सरकारी संगठन ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (सीपीआईएल) द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है, जिसमें वर्ष 2018 में जोड़ी गई धारा 17ए की वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि पूर्व मंजूरी की अनिवार्यता भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करती है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सरकार ही सक्षम प्राधिकार होने के कारण अक्सर मंजूरी नहीं देती, जिससे भ्रष्टाचार के मामलों में जांच प्रभावित होती है। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने धारा 17ए का बचाव किया।

अब इस महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर अंतिम फैसला बड़ी पीठ द्वारा सुनाया जाएगा।

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