नयी दिल्ली, एक फरवरी – वामपंथी दलों ने रविवार को पेश केंद्रीय बजट को जनविरोधी और संघीय ढांचे के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार आम लोगों की कीमत पर पूंजीपतियों के हितों को बढ़ावा दे रही है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कहा कि 2025-26 के बजट अनुमानों की तुलना में कई केंद्रीय और केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के आवंटन में भारी कटौती की गई है। पार्टी के अनुसार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, पीएम पोषण, प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएम-श्री), प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाई), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएम-एमएसवाई), प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण व शहरी) और फसल बीमा योजना के बजट में कमी आई है। साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के कल्याण के लिए आवंटन भी घटाया गया है।
माकपा ने दावा किया कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया यह नौवां बजट मोदी सरकार की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें कुछ बड़े कारोबारी घरानों और अमीर वर्ग के संकीर्ण हितों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि इसका बोझ मेहनतकश लोगों, सामाजिक रूप से वंचित वर्गों और व्यापक राष्ट्रीय आर्थिक हितों पर डाला जा रहा है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सांसद पी. संदोष कुमार ने बजट भाषण को लोगों की कठिनाइयों से मुंह मोड़ने वाला बताते हुए कहा कि यह शक्ति और संसाधनों के केंद्रीकरण का संकेत देता है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, जब आम लोग गिरती वास्तविक आय, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, मांग को पुनर्जीवित करने या आवश्यक सार्वजनिक खर्च बढ़ाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई। भाकपा ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सृजन के लिए आवंटन में कटौती का भी आरोप लगाया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने कहा कि 2026-27 का बजट कृषि व किसानों, मजदूरों, युवाओं और महिलाओं की लगातार उपेक्षा को रेखांकित करता है। पार्टी के अनुसार बढ़ती असमानता, कम आय, उच्च बेरोजगारी और जीवनयापन की बढ़ती लागत के बीच आमदनी बढ़ाने के लिए किसी ठोस घोषणा की उम्मीद थी, लेकिन बजट इस मोर्चे पर विफल रहा।
आॅल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने भी बजट को “जनता के साथ विश्वासघात” करार देते हुए इसकी आलोचना की।
