नयी दिल्ली, 15 जनवरी : उच्चतम न्यायालय ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत की अनिवार्यता को लेकर सभी उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयू) और अन्य विधि विद्यालयों से उनकी राय और सुझाव मांगे हैं। अदालत ने कहा कि इस विषय पर किसी भी संभावित बदलाव से पहले देशभर के हितधारकों की प्रतिक्रिया आवश्यक है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ भूमिका ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में दिव्यांगजन (पीडब्ल्यूडी) श्रेणी के विधि स्नातकों को न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत की शर्त से छूट देने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दिव्यांग विधि स्नातकों को प्रायः वकालत में अवसर नहीं मिलते, ऐसे में यह मानदंड उनके लिए बाधक बनता है।
पीठ ने हालांकि स्पष्ट किया कि पात्रता मानदंड सभी विधि स्नातकों के लिए समान होने चाहिए। अदालत ने कहा कि विशिष्ट श्रेणियों के लिए अलग-अलग छूट देने से सेवा में आने के बाद हीन भावना पैदा हो सकती है और देशभर में एकरूप नियमों की आवश्यकता है। याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश में विशेष रूप से सक्षम उम्मीदवारों को दी गई छूट का उदाहरण भी रखा, लेकिन अदालत ने समानता के सिद्धांत पर जोर दिया।
पीठ ने यह भी माना कि 20 मई को दिए गए फैसले के बाद युवा विधि स्नातकों में निराशा और हतोत्साह देखा गया है। अदालत ने कहा, “हमें जानकारी मिली है कि इस निर्णय से युवा छात्र निराश हैं। हम एनएलयू और सभी उच्च न्यायालयों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने की योजना बना रहे हैं। यदि किसी बदलाव की आवश्यकता होगी, तो वह सभी के लिए समान रूप से किया जाएगा।”
अदालत ने निर्देश दिया कि सभी उच्च न्यायालय इस आदेश को अपने-अपने मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें और उच्च न्यायालयों, एनएलयू तथा विधि विद्यालयों से अनुरोध किया कि वे चार सप्ताह के भीतर न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत के मानदंड पर अपने सुझाव प्रस्तुत करें।
गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने 20 मई को स्पष्ट किया था कि नए विधि स्नातक सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल नहीं हो सकते और प्रवेश स्तर के पदों के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को कम से कम तीन वर्ष की वकालत का अनुभव होना अनिवार्य है।
