वाराणसी/जौनपुर। पूर्वांचल के कई जिलों में ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण की रणनीति अब बदल गई है। अब धर्म बदलने वालों के सरनेम नहीं बदले जा रहे, ताकि उनकी नई पहचान उजागर न हो और सरकारी योजनाओं, आरक्षण व अन्य लाभों पर कोई असर न पड़े। पुलिस जांच में यह नया ट्रेंड सामने आया है कि अब धर्म परिवर्तन कराने वाले मिशनरी स्थानीय समुदायों में घुल-मिलकर काम कर रहे हैं और यह काम ऑनलाइन चंगाई सभाओं के जरिए भी जारी है।
जौनपुर की एक आशा कार्यकर्ता, जो खुद धर्म परिवर्तन कर चुकी है, अब दूसरों को भी ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है। उसने बताया कि वह सिर्फ “लॉकेट पहनती है” और अपनी पुरानी पहचान बनाए रखती है। उसके मुताबिक अब सभाएं गुप्त तरीके से मोबाइल के जरिए होती हैं—शुक्रवार और रविवार को मुंबई से ऑनलाइन प्रार्थना सभाएं संचालित की जा रही हैं।
पुलिस सख्ती के कारण अब बड़े स्तर पर सभाएं नहीं होतीं। जौनपुर में जब निगरानी बढ़ी तो कई लोग वाराणसी के भुल्लनपुर जाने लगे, जहां 250-300 लोग एकत्र होते हैं। सुल्तानपुर, मऊ और आजमगढ़ में भी ऐसे नेटवर्क के सक्रिय होने की खबरें हैं। मिशनरियों ने गरीब और पिछड़े वर्ग के युवाओं (फर्स्ट जनरेशन) को निशाना बनाना शुरू किया है। शादी, शिक्षा या इलाज के नाम पर आर्थिक मदद देकर पहले सहानुभूति हासिल की जाती है, फिर धीरे-धीरे परिवार को ‘चंगाई सभाओं’ से जोड़ा जाता है।
सूत्रों के मुताबिक, धर्मांतरण कराने वाले बिचौलियों को प्रति व्यक्ति 25 से 50 हजार रुपये तक का कमीशन दिया जाता है। जौनपुर के खुज्झी निवासी वीरेंद्र विश्वकर्मा, जिन्होंने एक साल पहले अपने मूल धर्म में वापसी की थी, ने बताया कि “प्रार्थना सभाओं में पहले नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं और फिर ‘यीशु के नाम का पानी’ पिलाया जाता है।”
जौनपुर पुलिस ने इस साल अब तक चार केस दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया है। एसपी डॉ. कौस्तुभ ने कहा, “लोभ-लालच के जरिए धर्म परिवर्तन कराने वालों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। ऐसे मामलों में सख्ती जारी रहेगी और दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएंगे।”
पूर्वांचल के 10 जिलों में बढ़ती इन गतिविधियों ने प्रशासन को सतर्क कर दिया है। जांच एजेंसियां अब मिशनरियों के इस नए, गुप्त धर्मांतरण नेटवर्क की तह तक जाने में जुटी हैं।
