टोल प्लाजा और प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सीएक्यूएम को फटकार, दो हफ्ते में रिपोर्ट तलब

नयी दिल्ली, छह जनवरी । उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि आयोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन में “विफल” रहा है और दिल्ली की सीमाओं पर यातायात जाम कम करने के लिए टोल प्लाजा को अस्थायी रूप से बंद करने या स्थानांतरित करने के मुद्दे पर दो महीने का समय मांगे जाने को अस्वीकार कर दिया।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि सीएक्यूएम में गंभीरता का अभाव स्पष्ट है। अदालत ने टिप्पणी की कि दिल्ली-एनसीआर में बिगड़ते वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के कारणों की पहचान करने और दीर्घकालिक समाधान तलाशने में आयोग किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखा रहा है।

गौरतलब है कि गंभीर वायु प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर 2025 को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को निर्देश दिया था कि वे दिल्ली की सीमाओं पर स्थित नगर निगम के नौ टोल प्लाजा को अस्थायी रूप से बंद करने या स्थानांतरित करने पर विचार करें, ताकि भारी यातायात जाम और उससे उत्पन्न प्रदूषण को कम किया जा सके।

मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने सीएक्यूएम को दो सप्ताह के भीतर विशेषज्ञों की बैठक बुलाने और प्रदूषण के प्रमुख कारणों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। पीठ ने यह भी कहा कि आयोग को चरणबद्ध तरीके से दीर्घकालिक समाधानों पर काम शुरू करना चाहिए और विभिन्न हितधारकों के दबाव से अप्रभावित रहते हुए टोल प्लाजा के मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेना चाहिए।

सुनवाई के दौरान सीएक्यूएम की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने हितधारकों के साथ हुई बैठकों का हवाला देते हुए टोल प्लाजा के मुद्दे पर दो महीने का समय मांगा। इस पर अदालत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहला कदम प्रदूषण के कारणों की पहचान करना है। पीठ ने कहा, “क्या आप प्रदूषण के कारणों की पहचान कर पाए हैं? भारी वाहन इसमें बड़ा योगदान दे रहे हैं। दो जनवरी को बैठक बुलाकर दो महीने का समय मांगना हमें स्वीकार्य नहीं है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह मामले को दो सप्ताह से अधिक समय के लिए स्थगित नहीं करेगी और प्रदूषण के मुद्दे पर निरंतर निगरानी रखेगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि समाधान तलाशने के बजाय एमसीडी ने हलफनामा दायर कर टोल प्लाजा को अपनी आय का स्रोत बताया है, जो चिंताजनक है।

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क के रूप में एकत्र धनराशि का 50 प्रतिशत हिस्सा आवंटित करने के निर्देश के लिए आवेदन दायर किया है। अदालत ने कहा कि सरकारी खजाने पर संभावित प्रभावों की जांच किए बिना इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने जैसे एकतरफा निर्णय नहीं लिए जा सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि सीएक्यूएम ने कोई ठोस योजना या दीर्घकालिक सुधारात्मक उपाय प्रस्तुत करने के बजाय केवल एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है, जो आयोग की गंभीरता को नहीं दर्शाती और अदालत द्वारा उठाए गए कई अहम मुद्दों पर मौन है।

पर्यावरणविद् एम.सी. मेहता द्वारा दायर जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 21 जनवरी की तारीख तय की है। इससे पहले, 17 दिसंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण संकट को “वार्षिक समस्या” बताते हुए इससे निपटने के लिए व्यावहारिक और प्रभावी समाधानों की आवश्यकता पर जोर दिया था। साथ ही, 12 अगस्त के अंतरिम आदेश में संशोधन कर बीएस-चार उत्सर्जन मानकों को पूरा न करने वाले पुराने वाहनों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की अनुमति भी दी गई थी।

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