प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में जाली प्रमाणपत्रों के आधार पर सहायक अध्यापक पदों पर की गई नियुक्तियों को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को व्यापक जांच के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि ऐसी सभी अवैध नियुक्तियों को रद्द किया जाए, दोषियों से वेतन की वसूली हो और इसमें मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह निर्देश गरिमा सिंह नामक महिला की रिट याचिका खारिज करते हुए दिए। अदालत ने राज्य के प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को आदेश दिया है कि यह पूरी प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जाए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी सर्कुलर और निर्देशों के बावजूद शिक्षा व्यवस्था की शुचिता बनाए रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारी अवैध नियुक्तियों के खिलाफ प्रभावी और समय पर कार्रवाई करने में विफल रहे हैं। अदालत ने इसे अत्यंत चिंताजनक बताया।
मामले में याचिकाकर्ता गरिमा सिंह की नियुक्ति देवरिया जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) द्वारा रद्द की गई थी। जांच में उनके शैक्षणिक दस्तावेज और निवास प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए थे। गरिमा सिंह को जुलाई 2010 में सहायक अध्यापिका के पद पर नियुक्त किया गया था और उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक सेवा दी थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जाली दस्तावेजों के आधार पर या तथ्यों को छिपाकर प्राप्त की गई नियुक्तियों के मामलों में लाभार्थी उत्तर प्रदेश सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के तहत जांच की मांग नहीं कर सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता से न केवल धोखाधड़ी को बढ़ावा मिलता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जड़ों पर भी चोट पहुंचती है, जिससे विद्यार्थियों के हितों को गंभीर नुकसान होता है। न्यायालय ने दो टूक कहा कि विद्यार्थियों का हित सर्वोपरि है।
हाईकोर्ट ने 22 जनवरी को दिए गए अपने निर्णय में यह भी निर्देश दिया कि फर्जी नियुक्तियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
